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________________ ६७० कसाय पाहुड सुत्त [१३ संयमलब्धि-अर्थाधिकार ११. तं जहा । १२. जो संजमं पटमदाए पडिवज्जदि तस्स दुविहा अद्धा, अधापवत्तकरणद्धा च अपुव्वकरणद्धा च..... . १३. अधापवत्तकरण-अपुवकरणाणि जहा संजमासंजमं पडिवज्जमाणयस्स परू विदांणि तहा संजमं पडिवज्जमाणयस्स वि कायन्याणि । १४. तदो पढमसमए संजमप्पहुडि अंतोमुत्तमणंतगुणाए चरित्तलद्धीए वड्डदि । १५. जाव चरित्तलद्धीए एगंताणुवड्डीए वड्डदि ताव अपुव्यकरणसण्णिदो भवंदि । १६. एयंतरवड्डीदो से काले चरित्तलद्धीए सिया वड्डेज्ज वा, हाएज्ज वा, अवढाएज्ज वा । १७. संजमं पडिवज्जमाणयस्स वि पडमसमय-अपुवकरणमादि कादण जाव ताव अधापवत्तसंजदो त्ति एदम्हि काले इमेसिं पदाणमप्पाबहुओं कादव्वं । १८. तं जहा. । १९. अणुभागखंडय-उक्कीरणद्धाओ हिदिखंडयुक्कीरणद्धाओ जहण्णुक्क विशेषार्थ-उक्त चारो प्रस्थापन-गाथाओकी विभाषा संयमासंयमलब्धिके समान ही करना चाहिए । हाँ, यहॉपर संयमासंयमके स्थानपर संयम · कहना चाहिए। यतः संयमलब्धि मनुष्यके ही होती है, अत: वन्ध-उदय-सत्त्वसम्बन्धी प्रकृतियोको गिनाते हुए मनुष्यगतिमें संभव बन्धादिके योग्य प्रकृतियोकी परिगणना करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जो और भी थोड़ा-बहुत भेद है, वह जयधवला टीकासे जानना चाहिए। चूर्णिसू०-वह विभाषा इस प्रकार है-जो संयमको प्रथमतासे अर्थात् बहुलतासे प्राप्त होता है, उसके अधःप्रवृत्तकरणकाल और अपूर्वकरणकाल, ये दो काल होते हैं ॥११-१२॥ विशेषार्थ-पुनः पुनः संयमको प्राप्त करनेवाले वेदकसम्यग्दृष्टि या वेदक-प्रायोग्य मिथ्यादृष्टिके अनिवृत्तिकरण नहीं होता है। अनादि-मिथ्यादृष्टिके उपशमसम्यक्त्वके साथ संयमके प्राप्त होते समय यद्यपि तीनो करण होते है, परन्तु यहाँ उसकी विवक्षा नहीं की गई है, क्योकि, वह दर्शनमोहकी उपशमनाके ही अन्तर्गत आ जाता है । ___ चूर्णिस०-अधःप्रवृत्तकरण और अनिवृत्तिकरण जिस प्रकार संयमासंयमको प्राप्त होनेवाले जीवके प्ररूपण किये गये हैं, उसी प्रकार संयमको प्राप्त होनेवाले जीवके भी प्ररूपण करना चाहिए । तत्पश्चात् प्रथम समयमें संयमके. ग्रहण करनेसे लेकर अन्तर्मुहूर्त काल तक वह जीव अनन्तगुणी चारित्रलब्धिसे वृद्धिको प्राप्त होता है। जब तक यह जीव एकान्तानुवृद्धिरूप चारित्रलब्धिसे बढ़ता रहता है, तब तक वह 'अपूर्वकरण' संज्ञावाला रहता है। एकान्तानुवृद्धिके पश्चात् अनन्तर कालमे वह चारित्रलब्धिसे कदाचित् वृद्धिको प्राप्त हो सकता है, कदाचित् हानिको प्राप्त हो सकता है और कदाचित् तदवस्थ भी रह सकता है ।।१३-१६॥ . चूर्णिसू०-संयमको प्राप्त होनेवाले जीवके अपूर्वकरणके प्रथम समयसे. आदि करके जब तक वह अधःप्रवृत्तसंयत अर्थात् स्वस्थानसंयत रहता है, तब तक इस मध्यवर्ती कालमे वक्ष्यमाणः पदोंका अल्पवहुत्व करना चाहिए । वक्ष्यमाण पद इस प्रकार हैं-जघन्य अनुभागकांडक-उत्कीरणकाल,, उत्कृष्ट अनुभागकांडक-उत्कीरणकाल, उत्कृष्ट स्थितिकांडक-उत्कीरणकाल
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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