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________________ ६६० कसाय पाहुड सुत्त [१२ संयमासंयमलब्धि-अर्थाधिकार भागहीणेण हिदि बंधदि । जे सुभा कम्मंसा ते अणुभागेहि अणंतगुणेहिं बंधदि । जे असुहकम्मंसा, ते अणंतगुणहीणेहिं* बंधदि । ८. विसोहीए तिव्व-मंदं वत्तइस्सामो। ९. अधापवत्तकरणस्स जदोप्पहुडि विसुद्धो तस्स पडमसमए जहणिया विसोही थोवा । १०. विदियसमए जहणिया विसोही अणंतगुणा । ११. तदियसमए जहणिया विसोही अणंतगुणा । १२. एवमंतोमुहुत्तं जहणिया चेव विसोही अणंतगुणेण गच्छइ । १३. तदो पढमसमए उक्कस्सिया विसोही अणंतगुणा। १४ सेस-अधापवत्तकरणविसोही जहा दंसणमोह-उवसामगस्स अधापवत्तकरणविसोही तहा चेव कायव्वा । अनुभागसत्त्वको द्विस्थानीय करते हैं। तत्पश्चात् अधःप्रवृत्तकरण नामकी अनन्तगुणी विशुद्धिके द्वारा विशुद्ध होता है । यहॉपर न स्थितिकांडकघात होता है और न अनुभागकांडकघात होता है । ( न गुणश्रेणी होती है । ) केवल स्थितिबन्धके पूर्ण होनेपर पल्योपमके संख्यातवें भागसे हीन स्थितिबन्धके द्वारा नवीन कर्मोंकी स्थितिको बॉधता है । जो शुभ कर्मरूप प्रकृतियाँ हैं, उन्हें अनन्तगुणित अनुभागोके साथ वॉधता है और जो अशुभ कर्मरूप प्रकृतियाँ हैं, उन्हे अनन्तगुणित हीन अनुभागोके साथ बॉधता है ॥३-७॥ चूर्णिसू०-अव संयमासंयमलब्धिको प्राप्त करनेवाले जीवके विशुद्धिकी तीव्र-मन्दता कहते हैं-अधःप्रवृत्तकरणके जिस समयसे विशुद्ध हुआ है, उसके प्रथम समयमें जघन्य विशुद्धि सबसे कम है । उससे द्वितीय समयमे जघन्य विशुद्धि अनन्तगुणी है । उससे तृतीय समयमे जघन्य विशुद्धि अनन्तगुणी है । इस प्रकार अन्तर्मुहूर्त तक जघन्य विशुद्धि ही अनन्तगुणित क्रमसे बढ़ती जाती है । इसके पश्चात् अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समयमें उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्तगुणी होती है । शेष अधःप्रवृत्तकरण-सम्बन्धी विशुद्धियाँ, जिस प्रकार दर्शनमोहोपशामकके अधःप्रवृत्तकरणमे वतलाई गई हैं, उसी प्रकारसे यहॉपर भी उनका निरूपण करना चाहिए ।। ८-१४॥ * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'अणंतगुणहीणहि' इस पाठके स्थानपर 'अणंतगुणेहिं [ हीणा-] ऐसा पाठ मुद्रित है । ( देखो पृ०.१७७८) ' ताम्रपत्रवाली प्रतिमें सूत्राक १४ के अनन्तर निम्नलिखित चार सूत्र और मुद्रित हैं'सनमासजम पडिवज्जमाणस्स परिणामो केरिसो भवे १ । [जोगे कसाय उवजोगे लेस्सा वेदो य को हवे ॥-] काणि वा पुव्ववद्धाणि० २ [ के वा अंसे णिवधदि । कदि आवलिय पविसति कदिण्ह वा पवेसगो 1-] के असे झीयदे पुव्व० ३ [वधेण उदएण वा । अंतरं वा कहिं किच्चा के के खवगो कहिं ||~] किं ठिदियाणि कम्माणि० ४ [अणुभागेसु केसु वा | ओवट्टिदूण सेसाणि कं ठाण पडिवजदि' |-] इस उद्धरणमें कोष्ठकान्तर्गत पाठको सम्पादकने अपनी ओरसे पूर्व-निर्दिष्ट गाथासूत्रोंके अनुसार जीडा है। शेष अंश टीकाका अंग है। जो कि प्रकृत स्थलपर उद्धरणके रूपसे निर्दिष्ट किया गया है। (देखो पृ० १७७९)।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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