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________________ ११५ । संयमासंयम प्रस्थापक योग्यता- निरूपण ६५९ 1 C ३. एदस्स अणिओगद्दारस्स पुव्वं गमणिज्जा परिभासा । ४. तं जहा । ५. एत्थ अधापवत्तकरणद्धा अपुव्वकरणद्धा च अत्थि, अणियट्टिकरणं णत्थि । ६. संजमा - संजममंतोमुहुत्तेण लभिहिदि ति तदोपहुडि सन्चो जीवो आउगवज्जाणं कम्माणं विदिबंधं द्विदिसंतकम्मं च अंतोकोडाकोडीए करेदि । सुभाणं कम्माणमणुभागबंधमणुभागसंतकम्मं च चदुट्टाणियं करेदि । असुभाणं कम्माणमणुभागबंध प्रणुभागसंतकम्मं च दुट्ठाणियं करेदि । ७. तदो अधापवत्तकरणं णाम अनंतगुणाए विमोहीए विसुज्झदि । पन्थि ट्ठिदिखंडयं वा अणुभागखंडयं वा । केवलं ट्ठिदिबंधे पुण्णे पलिदोवमम्स संखेज्जदिकषायोके द्विस्थानीय, त्रिस्थानीय और चतुःस्थानीय अनुभागके उदद्याभावको, तथा उदयमें आनेवाले भी कषायोके सर्वघाती स्पर्धकोंके उदयाभावको अनुभागोपशामना कहते हैं । अनुदय - प्राप्त कषायोंके प्रदेशों के उदयाभावको प्रदेशोपशामना कहते हैं । इन चारो प्रकारकी उपशामनाओंका इस अधिकारमे वर्णन किया जायगा । जयधवलाकारने संयमासंयमलब्धि और 'वड्डावड्डी' का एक और भी अर्थ किया है । वह यह कि लब्धिस्थान तीन प्रकारके होते हैं - प्रतिपातस्थान, प्रतिपद्यमानस्थान और अप्रतिपात - अप्रतिपद्यमानस्थान । इन तीनो प्रकारके स्थानोकी प्ररूपणा उक्त दोनों अनुयोगद्वारोमें निबद्ध समझना चाहिए । 'वड्डावड्डी' यह पद वृद्धि और अपवृद्धि के संयोगसे बना है, अतएव यहाँ वृद्धिपदसे संयमासंयम या संयमको प्राप्त होनेवाले जीवके निरन्तर विशुद्धिरूपसे बढ़ते ही रहनेवाले एकान्तानुवृद्धिरूप परिणामोंका ग्रहण करना चाहिए । इसी प्रकार संक्लेशके वशसे प्रतिसमय अनन्तगुणी हानिके द्वारा संयमासंयम या संयमलब्धिके पतनशील परिणामोको 'अपवृद्धि' कहते हैं । इस प्रकारके वृद्धि-हानिरूप परिणामोका भी इस अधिकारमे वर्णन किया जायगा । इसी प्रकार 'उपशामना' पदसे भी यह सूचित किया गया है कि जिस प्रकार प्रथमोपशमसम्यक्त्वको प्राप्त होने वाले जीवके दर्शनमोहकी उपशामनाका विधान किया गया है, उसी प्रकार से यहॉपर भी उपशमसम्यक्त्वके साथ संयमासंयम या संयमलब्धिको प्राप्त करनेवाले जीवके उपशामनाका निरूपण करना चाहिए। इस प्रकार उक्त सर्व 'अर्थोंका निरूपण इस अधिकारमे किया जायगा । चूर्णिसू०० - इस अनुयोगद्वार में पहले गाथासूत्रसे सूचित अर्थकी परिभाषा जानने योग्य है । उसे इस प्रकार जानना चाहिए - यहॉपर, अर्थात् संयमासंयमको प्राप्त होनेवाले वेदकसम्यग्दृष्टिके अथवा वेदक- प्रायोग्य मिध्यादृष्टिके अधःप्रवृत्तकरणकाल और अपूर्वकरणकाल होता है, अनिवृत्तिकरण नहीं होता है । ( क्योकि, कर्मोंकी सर्वोपशामना या क्षपणा करनेके लिए समुद्यत जीवके ही अनिवृत्तिकरण होता है । ) संयमासंयमको अन्तर्मुहूर्त कालसे प्राप्त करेगा, इस कारण वहाँसे लेकर सर्व जीव आयुकर्मको छोड़कर शेष सात कर्मों के स्थितिबन्ध - को और स्थितिसत्त्वको अन्तः :कोड़ाकोड़ी के प्रमाण करते हैं । शुभ कर्मोंके अनुभागबन्धको और अनुभागसत्त्वको चतुःस्थानीय करते हैं । तथा अशुभ कर्मोंके अनुभागबन्धको और
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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