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________________ कैसायपाहुडसुत्त इमंमि जिणसासणे दुस्समावलेण खीयमाणमेहाउसद्धा-संवेगउजमारंभं अञ्जकालिय साहुजणं अणुग्धेत्तुकामेण विच्छिन्नकम्मपयडिमहागंथत्थसंबोहणत्थं भारद्धं आइरिएणं तग्गुणणामगं कम्मपयडीरागहणी णाम पगरणं । अव सित्तरीचूर्णिकी उत्थानिका देखिये सुह-दुक्ख-तकारणसरूवपरिगणाणामो सव्वजीवाणं सोक्खकारणाऽऽयाणदुक्खकारणपरिच्चागनिमित्तो सव्वदुक्खविमोक्खलक्खणो परमसुहलंभो ति सुहदुक्ख-तकारणनिदेसो कायन्यो । दोसोवसामणाश्रो उत्तरकालं आरोग्गसुहलंभ इव सो सुहो सभावित्रो त्ति पढमममेव दुक्ख-तकारणपरूवणं परमरिस करेंति त्ति पच्छा सुहकारण-सुहाण परूवणं त्ति | ताई च कम्मपगयातिमहागंथेसु भणियाई । ते य गंथा दुरवगाह ति काउं कालदोसोपहयमेहाऽऽउ-बलाणं अजकालियाणं साहूणं अणुग्गहत्थं आयरिएण कयं पमाणणिप्पएणनामयं सत्तरि त्ति पगरणं । पाठक तीनों उत्थानिकाओंकी समता और एकताका स्वय ही अनुभव करेंगे । प्रथम और द्वितीय उत्थानिकामे तो आदिसे अन्ततक कितना अधिक शब्द-साम्य है, यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं है, तीसरी उत्थानिकाके प्रारम्भिक भागका भी वही आशय है, जो कि प्रथम और द्वितीय उत्थानिकाओके प्रारम्भिक भागोका है । अन्तिम भाग तो शब्दशः और अर्थशः समान है ही। इस प्रकार उक्त तीनों ग्रन्थोके मंगल-पद्योंकी तथा उत्थानिकाओंकी रचना-शैली और शब्द-विन्याससे स्पष्ट है कि तीनो चूर्णियोंके रचयिता एक ही आचार्य हैं । यह शका की जा सकती है कि उपर्युक्त समता और तुलनासे भले ही तीनों ग्रन्थोंकी चूर्णिके कर्ता एक सिद्ध हो जावे, परन्तु कसायपाहुडचूर्णिके प्रारम्भमे न तो मंगलाचरण ही किया गया है और न कोई उत्थानिका ही दी गई है, फिर उसकी उक्त तीनों चूर्णियोंके साथ समता तुलना या एक्ता कैसे सम्भव है, और कैसे इन तीनोके साथ उसके भी रचयिताके एकत्वकी संभावना की जा सकती है ? इस शंकाका समाधान यह है कि यतः कम्मपयडी, सतक और सित्तरीके रचयिताओंने अपने-अपने ग्रन्थके प्रारम्भमे मगलाचरण किया है और साथ ही अपने-अपने प्रतिपाद्य विपयके सम्बन्धादिको भी प्रकट किया है, अतः उनमें उसी सरणीका अनुसरण चर्णिकारने किया है। किन्तु कसायपाहुडकी रचना अतिसक्षिप्त होनेसे यतः ग्रन्थकारने ही जब प्रारम्भमे न मंगलाचरण ही किया और न सम्बन्ध, अभिधेयादिको भी कहा, तब चर्णिकारने भी ग्रन्थकारका अनुसरण कर न मगल चरण हो किया और न कोई उत्थानिका ही लिखी, और इस प्रकार मूलग्रन्थकी सूत्रात्मक सक्षिप्त रचनाक समान अपनी चूर्णिको भी अतिसक्षिप्त, असंदिग्ध एवं सारवान् पदोस रचा । यही कारण है कि फसायपाहुडचूर्णिकै प्रत्येक वाक्यको उसके टीकाकारोंने सूत्रसंज्ञा दी है और इसलिए उसका प्रत्येक वाक्य 'चूर्णिसूत्र' नामसे ही प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ है। १-जोनों ग्रन्थोंके मगलपद्योका अवतार उसके सम्बन्ध-अभिधेयको बतलाते हुए इस प्रकार किया गया है
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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