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________________ ६४६ फसाय पाशुद्ध सुत्त [११ दर्शनमोह-क्षपणाधिकार अणुभागखंडयं, सो चेव द्विदिवंधो । गुणसेही अण्णा । ३१. एवमंतोमुहत्तं जाव अणुभागखंडयं पुण्णं । ३२. एवमणुभागखंडयसहस्सेसु पुण्णेसु अण्णं ट्ठिदिखंडयं, हिदिबंधमणुभागखंडयं च पट्टवेइ । ३३. पहमं द्विदिखंडयं बहुअं, विदियं द्विदिखंडयं विसेसहीणं, तदियं द्विदिखंडयं विसेसहीणं । ३४.एवं पढमादो द्विदिखंडयादो अंतो अपुचकरणद्धाए संखेज्जगुणहीणं पि अस्थि । ३५. एदेण कमेण द्विदिखंडयसहस्सेहिं बहुपहिं गदेहि अपुब्धकरणद्धाए चरिमसमयं पत्तो। ३६. तत्थ अणुभागखंडयउकीरणकालो हिदिखंडयउक्कीरणकालो द्विदिवंधकालो च समगं समत्तो। ३७. चरिमसमय-अपुवकरणे हिदिसंतकम्म थोवं । ३८. पढमसमय-अपुत्रकरणे ट्ठिदिसंतकरम संखेज्जगुणं । ३९. द्विदिबंधो वि पढमसमयअपुन्चकरणे बहुगो, चरिमसमय-अपुवकरणे संखेज्जगुणहीणो । ४०. पहमसमय-अणियट्टिकरणपविट्ठस्स अपुव्वं द्विदिखंडयमपुव्यमणुभागखंडयमपुव्वो हिदिवंधो, तहा चेव गुणसेड़ी। ४१. अणियट्टिकरणस्स पडणसमये दंसणमोहणीयमप्पसत्थमुवसामणाएं अणुवसंतं, सेसाणि कम्माणि उपसंताणि च अणुवसंताणि च । स्थितिबन्ध है, किन्तु गुणश्रेणी अन्य होती है । इस प्रकार अन्तर्मुहूर्त काल तक एक अनुभागकांडक पूर्ण होता है । इस क्रमसे सहस्रों अनुभागकांडकोके पूर्ण होनेपर अन्य स्थितिकांडकको, अन्य स्थितिवन्धको और अन्य अनुभागकांडकको प्रारम्भ करता है। प्रथम स्थितिकांडकका आयाम बहुत है, द्वितीय स्थितिकांडकका आयाम विशेष हीन है, तृतीय स्थितिकांडकका आयाम विशेष हीन है । इस प्रकार अपूर्वकरण-कालके भीतर प्रथम स्थितिकांडकसे संख्यातगुणित हीन भी स्थिति कांडक होता है ॥२६-३४॥ चूर्णिसू०-इसी क्रमसे अनेक सहस्र स्थितिकांडकघातोके व्यतीत होनेपर अपूर्वकरणके कालका अन्तिम समय प्राप्त हो जाता है। उस अन्तिम समयमें चरम अनुभागकांडकका उत्कीरणकाल, स्थितिकांडकका उत्कीरणकाल और स्थितिबन्धका काल एक साथ समाप्त हो जाता है। अपूर्वकरणके अन्तिम समयमें स्थितिसत्त्व अल्प है। इससे इसी अपूर्वकरणके प्रथम समयमें स्थितिसत्त्व संख्यातगुणित है। स्थितिवन्ध भी अपूर्वकरणके प्रथम समयमें बहुत है और उससे अपूर्वकरणके अन्तिम समयमें संख्यातगुणित हीन है।। ३५-३९॥ इस प्रकार अपूर्वकरणकी प्ररूपणा समाप्त हुई। चूर्णिसू०-अनिवृत्तिकरणमें प्रवेश करनेके प्रथम समयमे दर्शनमोहनीयकर्मका अपूर्व स्थितिकांडक होता है, अपूर्व अनुभागकांडक होता है और अपूर्व स्थितिवन्ध होता है । किन्तु गुणश्रेणी अपूर्वकरणके समान ही प्रतिसमय असंख्यातगुणी रहती है । अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमें दर्शनमोहनीयकर्म अप्रशस्तोपशामनाके द्वारा अनुपशान्त रहता है। शेष फर्म उपशान्त भी रहते हैं और अनुपशान्त भी रहते हैं ॥४०-४१॥ १ का अप्पसत्थ-उवसामणा णाम? कम्मपरमाणूण वज्झतरगकारणवसेण कत्तियाण पि उदीरणावसेण उदयाणागमणपण्णा अप्पसत्थ-उवसामणा त्ति भण्णदे | जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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