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________________ ६४५ गा० ११४] दर्शमोहक्षपणा प्रस्थापक स्वरूप-निरूपण दसणमोहणीयमक्खवेदण कसाए उवसामेइ, तेसिं दोण्हं पि जीवाणं कसायेसु उवसंतेसु तुल्लकाले समधिच्छिदे तुल्लं ठिदिसंतकम्मं । २५. जो पुन्वं कसाए उवसामयूण पच्छा दसणमोहणीयं खवेइ, अण्णो पुव्वं दसणमोहणीयं खवेयूण पच्छा कसाए उवसामेइ, एदेसि दोण्हं पि खीणदंसणमोहणीयाणं खवणकरणेसु उवसमकरणेसु च णिट्ठिदेसु तुल्ले काले विदिक्कते जेण पच्छा दंसणमोहणीयं खचिदं तस्स द्विदिसंतकम्मं थोवं । जेण पुन्वं दंसणमोहणीयं खवेयूण पच्छा कसाया उवसामिदा, तस्स द्विदिसंतकम्मं संखेजगुणं । २६. अपुव्वकरणस्स परमसमए जहण्णगेण कम्मेण उवट्ठिदस्स हिदिखंडगं पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागो। [ उक्कस्सेण उवट्ठिदस्स सागरोवमपुधत्तं । ] २७. हिदिवंधादो जाओ ओसरिदाओ द्विदीओ ताओ पलिदोवमस्स संखेज्जदिभागो । २८. अप्पसत्थाणं कम्माणमणुभागखंडयपमाणमणुभागफयाणमणता भागा आगाइदा । २९ गुणसेढी उदयावलियबाहिरा । ३०. विदियसमए तं चेव द्विदिखंडयं, तं चेव उसका स्थितिसत्कर्म प्रथम जीवकी अपेक्षा संख्यातगुणित अधिक है । जो जीव पहले दर्शनमोहनीयका क्षपण करके पीछे कषायोका उपशमन करता है, अथवा जो दर्शनमोहनीयका क्षपण नही करके कषायोका उपशमन करता है, इन दोनो ही जीवोके कपायोके उपशान्त होकर समान कालमें अवस्थित होनेपर दोनोका स्थितिसत्कर्म समान होता है। जो जीव पहले कषायोका उपशमन करके पीछे दर्शनमोहनीयका क्षय करता है, और दूसरा पहले दर्शनमोहनीयका क्षय करके पीछे कषायोका उपशमन करता है, इन दोनो ही दर्शनमोहके क्षपण करनेवाले जीवोंके क्षपणा-सम्बन्धी कार्योंके और उपशमना-सम्बन्धी कार्योंके सम्पन्न होनेपर, तथा समान कालके व्यतीत होनेपर जिसने पीछे दर्शनमोहनीयकर्मका क्षय किया है, उसके स्थितिसत्कर्म अल्प होता है। किन्तु जिसने पहले दर्शनमोहनीयका क्षय करके पीछे कषायोका उपशमन किया है, उसके स्थितिसत्कर्म संख्यातगुणित होता है ॥२१-२५॥ चूर्णिसू०-अपूर्वकरणके प्रथम समयमे जघन्य स्थितिसत्कर्मसे उपस्थित जीवका स्थितिकांडक पल्योपमके संख्यातवें भागप्रमाण है। यह जघन्य सत्त्व पहले कपायोका उपशमन करके क्षपणाके लिए उद्यत जीवके होता है। [ अपूर्वकरणके प्रथम समयमें उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्मसे उपस्थित जीवका स्थितिकांडक सागरोपमपृथक्त्व-प्रमाण होता है। यह उत्कृष्ट स्थितिसत्त्व कपायोका उपशमन न करके क्षपणाके लिए समुद्यत जीवके होता है। ] पूर्व स्थितिवन्धसे अर्थात् अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमे होनेवाले तत्प्रायोग्य अन्तःकोडाकोडीप्रमाण स्थितिबन्धसे जो स्थितियाँ इस समय अपसरण की गई हैं, वे पल्योपमके संख्यातवे भागप्रमाण हैं। अप्रशस्त कर्मों के अनुभागकांडकका प्रमाण अनुभागसत्त्वके स्पर्धकोके अनन्त वहुभाग है, जो कि घातके लिए ग्रहण किये गये हैं। अपूर्वकरणके प्रथम समयमे ही गुणश्रेणी भी प्रारंभ हो जाती है, वह गुणश्रेणी उदयावलीसे वाह्य गलितशेप-प्रमाण है। अपूर्वकरणके द्वितीय समयमें वही स्थितिकांडक है, वही अनुभागकांडक है और वही
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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