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________________ गा० ११४ ] . दर्शनमोहक्षपणा-प्रस्थापक स्वरूप-निरूपण ६४७ ४२. अणियट्टिकरणस्स पढमसमए दंसणमोहणीयस्स डिदिसंतकम्मं सागरोवमसदसहस्सपुधत्तमंतो कोडीए*। सेसाणं कम्माणं हिदिसंतकम्मं कोडिसदसहस्सपुधत्तमंतोकोडाकोडीए । ४३. तदो द्विदिखंडयसहस्सेहिं अणियट्टिअद्धाए संखेज्जेसु भागेसु गदेसु असणिहिदिवंधेण दसणमोहणीयस्स द्विदिसंतकम्यं समगं । ४४.तदो द्विदिखंडयपुधत्तेण चउरिदियबंधेण डिदिसंतकम्मं समगं । ४५. तदो हिदिखंडयपुधत्तेण तीह दियवंधेण डिदिसंतकम्मं समगं । ४६. लदो द्विदिखंडयपुधत्तेण बीदियवंधेण द्विदिसंतकम्म समगं । ४७. तदो डिदिखंडयपुधत्तेण एइंदियबंधेण हिदिसंतकम्मं समगं । ४८. तदो द्विदिखंडयषुधत्तेण पलिदोवपढिदिगं जादं दंसणमोहणीयडिदिसंतकम्यं । ४९. जाव पलिदोवमहिदिसंतकम्मं ताव पलिदोवमस संखेज्जदिभागो हिदिखंडयं, पलिदोवमे विशेषार्थ-कितने ही कर्म-परमाणुओका बाह्य और अन्तरंग कारणके वशसे, तथा कितने ही कर्म-परमाणुओका उदीरणाके वशसे उदयमें नहीं आनेको अप्रशस्तोपशामना कहते हैं । इसीको देशोपशामना तथा अगुणोपशामना भी कहते हैं । दर्शनमोहसम्बन्धी यह अप्रशस्तोपशामना अपूर्वकरणके अन्तिम समय तक बराबर चली आ रही थी, किन्तु अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमें ही वह नष्ट हो जाती है। पर शेष कर्मोंकी अप्रशस्तोपशामना यथासंभव होती भी है और नही भी होती है, उसके लिए कोई एकान्त नियम नहीं है । चूर्णिसू०-अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमें दर्शनमोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व अन्त:कोडी अर्थात् सागरोपमशतसहस्रपृथक्त्व, तथा शेष कर्मोंका स्थितिसत्त्व अन्तःकोड़ाकोड़ी अर्थात् सागरोपमकोटिशतसहस्रपृथक्त्व होता है। इसके पश्चात् सहस्रो स्थितिकांडकघातोके द्वारा अनिवृत्तिकरण-कालके संख्यात भागोके व्यतीत होनेपर दर्शनमोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व असंज्ञी जीवोके स्थितिबन्धके सदृश अर्थात् सागरोपमसहस्रप्रमाण हो जाता है। पुनः स्थितिकांडकघातपृथक्त्वके द्वारा दर्शनमोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व चतुरिन्द्रियजीवके स्थितिबन्धके सदृश अर्थात् सौ सागरोपमप्रमाण हो जाता है । पुनः स्थितिकांडकघातपृथक्त्वके द्वारा दर्शनमोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व त्रीन्द्रियजीवके स्थितिवन्धके सदृश अर्थात् पचास सागरोपमप्रमाण हो जाता है। पुनः स्थितिकांडकघातपृथक्त्वके द्वारा दर्शनमोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व द्वीन्द्रिय जीवके स्थितिबन्धके सदृश अर्थात् पच्चीस सागरोपमप्रमाण हो जाता है। पुनः स्थितिकांडकघातपृथक्त्वके द्वारा दर्शनमोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व एकेन्द्रिय जीवके स्थितिबन्धके सदृश अर्थात् एक सागरोपमप्रमाण हो जाता है । पुनः स्थितिकांडकघातपृथक्त्वके द्वारा दर्शनमोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व एक पल्योपम-प्रमाण स्थितिवाला हो जाता है। जब तक दर्शनमोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व एक पल्योपम-प्रमाण रहता है, तबतक स्थितिकांडकका आयाम पल्योपमका संख्यातवॉ भाग रहता है । पुनः दर्शन * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें :-मंतो कोडाकोडीए' ऐसा पाठ सूत्र और टीका दोनोंमें मुद्रित है। (देखो पृ० १७५०) । पर वह अशुद्ध है (देखो धवला भा० ६ पृ० २५४, पक्ति ८)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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