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________________ प्रस्तावना ५१ यहां यह जानने योग्य बात है कि वर्गणाओं का अर्थ कम्मपयडीकी गाथाओं में नहीं, किन्तु कम्मपयडीकी चूर्णिमें किया गया है। मूलगाथाओं मे तो वर्गणाओं के नाममात्र ही कहे गये है । इसके विशेष परिज्ञानार्थ कम्मपयडीके बन्धनकरणके १८, १६ और २० वीं गाथाओं पर लिखी हुई विस्तृत चूर्णिको देखना चाहिए । इस उद्धरणसे दो बातें सिद्ध होती है - पहली यह कि सत्कचूर्णि और कम्मपयडी - चूर्णिके रचयिता एक ही आचार्य हैं । दूसरी यह कि सतकचूर्णि से पहले कम्मपयडी चूर्णिकी रचना (२) अव सित्तरीचूर्णिसे कुछ ऐसे उद्धरण दिये जाते हैं जिनसे कि सित्तरीचूर्णि और कम्मपयडीचूर्णिके रचयिता एके सिद्ध होते हैं- (अ) उचट्टणा विही जहा कम्मपगडीसंगहणीए उचलणसंकमे तहा भाणियां । ( सित्तरी, पत्र ६१ । २ ) (a) तत्थ मिच्छद्दिस्सि मिच्छच उत्रसामणे विही जहा कम्मपगडी संगहणीए पढमसम्मत्तं उप्पाएंतस्स सा चैव भाणियव्वा । (स) अंतरकरणविही जहा कम्मपगडी संगहणीए । ( सित्तरी, पत्र ६४ / १ ) (ह) पढमट्ठितिकरणं जहा कम्मपग डिसंगहणीए । ( सित्तरी, पत्र ६५ / १ ) उक्त चारों उद्धरणोंमें जिन बातोंके विशेष-वर्णन देखने के लिए कम्मपय डिसंगहणीका उल्लेख किया गया है, उन सबका वर्णन मूलकम्मपयडीमें नहीं, अपितु कम्मपयडीकी चूर्णि में किया गया है, जोकि कम्मपयडीचूर्णि में निर्दिष्ट स्थानों पर पाया जाता है। इन उद्धरणोंसे भी दो बातें सिद्ध होती हैं- पहली यह कि सित्तरीचूर्णि और कम्मपयडीचूर्णिके रचयिता एक ही आचार्य हैं। दूसरी यह कि सित्तरीचूर्खिसे पहले कम्मपयडी - चूर्णिकी रचना हो चुकी थी । (३) अब सित्तरीचूर्ण में से ही कुछ ऐसे उद्धरण दिये जाते है, जिनमे कि स्पष्ट रूप से कसाय पाहुडचूर्णिका उल्लेख किया गया है (अ) तं वेयंतो वितिय कट्टडीओ तइयकिट्टीओ य दलियं घेणं सुहुमसांपराइयकिट्टी करे । तेसिं लक्खणं जहा कसायपाहुडे । (ब) एत्थ पुव्वकरण-अणियट्टिश्रद्धासु गाइ वतव्त्रगाईं जहा कसायपाहुडे कम्मपगडिसंगहणीए वा तहा वचव्वं । ( सित्तरी, पत्र ६२ / २ ) (स) चविधगस्स वेदोदर पुरिसवेदबंधे य जुग फिट्टे एकमेव उदयद्वाणं लब्भति । तं जहा - चउरहं संजलखाण एगयरं । एत्थ चचारि लंगा । × × × तं च कसा पाहुडादिसु विडति चिकाउ परिसेसिय । । ( सित्तरी पत्र १२ / २ ) इन उपर्युक्त उद्धरणोंसे तीन बातें सिद्ध होती हैं - पहली यह कि सित्तरीचूर्णि और कसायपाहुडचूर्णिके रचयिता एक ही आचार्य हैं । दूसरी यह कि कसायपाहुडचूर्णिकी रचना के पश्चात् सित्तरीचूर्णिकी रचना की गई है। और तीसरे उद्धरण से तीसरी बात यह सिद्ध होती है। कि उक्त तीनों ही चूर्णियोंके रचायेना एक ही आचार्य हैं ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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