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________________ कसायपाहुडसुत्त परन्तु यह सतकचूर्णिके अन्तमें पाई जानेवाली पुष्पिका किसी लेखक-द्वारा लिखी गई है, यह बात उक्त पंक्तिकी रचनासे ही स्पष्ट है और श्रीचन्द्रमहत्तरके नामके साथ 'शिताम्बर' पदका प्रयोग तो उसकी अवास्तविकताका और भी अधिक परिचायक है, क्योंकि, प्रथम तो उसके देनेके कोई आवश्यकता ही नहीं थी, दूसरे दि० परम्परामें श्रीचन्द्रमहत्तर नामके कोई भी व्यक्ति नहीं हुए है। फिर भी यहां पर 'शितांबर' पद संस्कृत या प्राकृत दोनों भाषाओंके अनुसार अशुद्ध है। ज्ञात होता है कि सित्तरीचूर्णिकी दिगम्बराम्नायताके अपलापके लिए उक्त वाक्य पीछेसे जोड़ा गया है। सतकचूर्णि और सित्तरीचूर्णि भी प्रा० यतिवृषभ-रचित हैं सतक और सित्तरी नामक दो ग्रन्थों का परिचय पहले दिया जा चुका है। इन दोनों ही प्रकरणों पर चूर्णियां पाई जाती हैं और वे मुद्रित होकर प्रकाशमे भी आ चुकी हैं। सतक या शतकप्रकरणकी चूर्णि राजनगरस्थ श्रीवीरसमाजकी ओरसे वि० सं० १६७८ में प्रकाशित हुई है और सित्तरी या सप्ततिकाकी चूर्णि श्री मुक्ताबाई ज्ञानमन्दिर डभोई (गुजरात ) से वि० स० १९६६ में प्रकाशित हुई है। दोनों ही प्रकरणों पर जो चूर्णियां प्रकाशित हुई हैं, उनपर किसी आचार्यका रचयितारूपसे नाम नहीं दिया गया है। शतकप्रकरणकी चूणिके ऊपर 'पूर्वाचार्यकृतचूर्णिसमलंकृतं श्री शतकप्रकरणम्' ऐसा वाक्य मुद्रित है । इसी प्रकार सित्तरीचूर्णिके आरम्भमें भी पाईणायरियकयचुरिणसमेया' ऐसा वाक्य मुद्रित है, जिसका अर्थ होता है-'प्राचीन आचार्यकृत चूर्णिसमेत' । अर्थात् इसके रचयिताका नाम भी अभी तक अज्ञात ही हैं। इन दोनों चूणियोंका अन्तर-आलोडन करके जब हम कम्मपयडीचूणि के साथ मिलान करते हैं, तब इस निष्कर्षपर पहुँचते हैं कि कम्मपयडीचर्णिके तथा इन दोनों चणियोंके रचयिता भी एक ही आचार्य हैं। और ये दोनों चूर्णियां भी उनकी ही कृतियां हैं, जिन्होंने कि कम्मपयडीचूर्णि और कसायपाहुडचूणिको रचा है। पाठकोंके निश्चयार्थ उक्त चूर्णियोंमेंसे कुछ ऐसे अवतरण दिये जाते हैं, जिनसे कि उक्त चारों ही चूर्णियोंकी एक-कत कता सिद्ध होती है-- (१) कम्मपयडीके वन्धनकरणमें वन्धके चारों भेदोंका लक्षण कह करके लिखा है मूलपगति-उत्तरपगतीणं विगप्पसामित्तभेदेण य जहा बंधसयगे भणिता, तहा चेव इहावि भाणियव्या। अर्थात् मूलप्रकृति और उत्तरप्रकृतियोंके विकल्प और स्वामित्वका जैसा वर्णन चन्धशतकमें किया गया है, वैसा ही वर्णन यहां पर भी करना चाहिए। इस उद्धरणसे यह सिद्ध है कि कम्मपयडीचूर्णिकार शतकप्रकरणसे जिसे कि बन्धशतक भी कहते हैं, भलीभांति परिचित थे । अब देखिए कि शतकर्णिकार वर्गणाश्रोके भेदोंका वर्णन करते हुए क्या लिखते हैं 'एतासिं अत्थो जहा कम्मपगडिसंगहणीए ।' ( मतकचूर्णि पत्र ४३) अर्थात् उक्त वर्गणाओंका अर्थ जैसा कम्मपयडिसंग्रहणीमें कहा, वैसा ही यहां पर जानना चाहिए।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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