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________________ प्रस्तावना सिद्धं सिद्धत्थसुयं बंदिय णिद्धोयसव्वकम्ममलं । कम्मट्ठगस्स करणद्वगुदयसंताणि चोच्छामि ॥१॥ बंधण-संकमणुव्वट्टणा य अवचट्टणा उदोरणया । उवसामणा णिवत्ती णिकायणा च त्ति करणाई ॥२॥ प्रथम गाथामें सिद्धस्वरूप सिद्धार्थसुत महावीरस्वामीको नमस्कार करके आठ कर्म सम्बन्धी आठो करणोंके तथा उनके साथ उदय और सत्त्वके कहनेकी प्रतिज्ञा की गई है और दुसरी गाथामें पाठ करणोंके नाम गिनाये गये हैं, जिनका कि वर्णन कम्मपयडीमें किया गया है। आठ करण इस प्रकार हैं-१.बन्धनकरण, २.सक्रमणकरण, ३. उद्वर्तनाकरण, ४. अपवर्तनाकरण, ५. उदीरणाकरण, ६. उपशामनाकरण, ७. निधत्तीकरण, और ८. निकाचनाकरण । इन आठों ही करणों के स्वरूपादिका कम्मपयडीमें विस्तृत निरूपण किया गया है और चूर्णिकारने अपनी चूर्णिमें उनके स्वरूपका बहुत सुन्दर विवेचन किया है, इसलिए तिलोयपणत्तीके अन्त में उन्होंने अपनी पूर्व रचनाके परिमाणका उल्लेख करते हुए उसके साथ तिलोयपण्णत्तीके भी परिमाणका उक्त गाथामें निर्देश कर दिया है । तथा निकाचनाकरणके अन्त में चर्णिकारने एवं अट्ट वि करणाणि समत्ताणि' इस प्रकारका वाक्य भी दिया है । जिससे सिद्ध है कि कम्भपयडीकी चूर्णि भी श्रा० यतिवृषभकी ही कृति है। यहां यह बात ध्यानमें रखना चाहिए कि उदय और सत्त्वको करणोंके अन्तर्गत नहीं गिना गया है और यही कारण है कि जहाँ पर आठ करणोंका स्वरूप समाप्त हुआ है, वहां चूर्णिकारने स्पष्टरूपसे लिखा है कि 'इस प्रकार आठों ही करणोंका स्वरूप समाप्त हुआ। कम्मपयडी, सतक और सित्तरीकी चर्णियोंके रचयिता एक हैं ____ कम्मपयडीचूर्णिके कर्ता रूपसे अभी तक किसी प्राचार्यके नामका कहीं कोई निर्देश नहीं मिलता है, तथापि कम्मपयडीके सम्पादकोंने उक्त ग्रन्थकी प्रस्तावनामें उसे अनुश्रुतिके अनुसार जिनदासमहत्तर-प्रणीत होनेकी सभावना व्यक्त की है, जो कि सभावना मात्र ही है, वास्तविक नहीं, क्योंकि उसकी पुष्टिमें कोई भी प्रमाण उपस्थित नहीं किया गया है । सित्तरीचूर्णिको कुछ लोग चन्द्रपिमहत्तर-द्वारा रचित होनेका अनुमान करते हैं, पर सित्तरीचूर्णिकी प्रस्तावनामें उसके सम्पादकोंने यह स्पष्टरूपसे लिखा है कि चन्द्रर्षिमहत्तर न तो सित्तरीके रचियता है और न उसकी चूर्णि ही उनकी रची हुई है। उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि चन्द्रर्पिमहत्तरने अपने पचसंग्रहके प्रारम्भमें सतक, सित्तरी आदि प्राचीन ग्रन्थोंका उल्लेख किया है और यह भी लिखा है कि एक स्थल पर सित्तरीचर्णिकारका मत चन्द्रपिमहत्तरके विरुद्ध जाता है। इससे यह सिद्ध है कि चन्द्रपिमहत्तर सित्तरीचूर्णि के प्रणेता नहीं हैं । ___ मुद्रित सतकचूर्णि पर कोई सम्पादकीय वक्तव्य या प्रस्तावना आदि नहीं है और न उसके आदि या अन्तमें कहीं चूर्णिकारके रूपमें किसी आचार्यके नामका उल्लेख है, तथापि मुद्रित सित्तरीचर्णिमे श्री शान्तिनाथजी भडार खंभातने प्राप्त सतकचूर्ति के अन्तिमपत्रके उत्तरार्घका फोटो दिया है, जिसमे अन्तिम पंक्ति इस प्रकार है "कृतिराचार्यश्रीचन्द्रमहत्तरशितांवरस्य । शतकस्य ग्रन्थस्य । प्रशस्तच्... । दि ३ शनौ लिखितेति ।"
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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