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________________ . उप गा० ९४] . उपशामक योग्यता-निरूपण ' (४०) के अंसे झीयदे पुव्वं बंधेण उदएण वा। ___ अंतरं वा कहिं किच्चा के के उवसामगो कहिं ॥१३॥ (४१) किं टिदियाणि कम्माणि अणुभागेसु केसु वा । ओवट्टदूण सेसाणि कं ठाणं पडिवजदि ॥१४॥ ३. एदाओ चत्तारि सुत्तगाहाओ अधापवत्तकरणस्स पडमसमए परूविदव्याओ। ४ तं जहा । ५. 'दंसणमोहउवसामगस्स परिणामो केरिसो भवे' त्ति विहासा । ६. तं जहा । ७. परिणामो विसुद्धो। ८. पुव्वं पि अंतोप्नुहुत्तप्पहुडि अणंतगुणाए विसोहीए विसुज्झमाणो आगदो। ९. 'जोगे'त्ति विहासा । १०. अण्णदरमणजोगो वा अण्णदरवचिजोगो वा दर्शनमोहके उपशममकालसे पूर्व बन्ध अथवा उदयकी अपेक्षा कौन-कौनसे काँश क्षीण होते हैं ? अन्तरको कहाँपर करता है और कहाँपर तथा किन कर्मोका यह उपशामक होता है ? ॥१३॥ दर्शनमोहका उपशम करनेवाला जीव किस-किस स्थिति-अनुभाग-विशिष्ट कौन-कौनसे कर्मोंका अपवर्तन करके किस स्थानको प्राप्त करता है और अवशिष्ट कर्म किस स्थिति और अनुभागको प्राप्त होते हैं । ॥१४॥ चूर्णिसू०-इन उपयुक्त चार सूत्र-गाथाओकी अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समयमे प्ररूपणा करना चाहिए। वह प्ररूपणा इस प्रकार है-'दर्शनमोहके उपशामकका परिणाम कैसा होता है ?' प्रथम गाथाके इस पूर्व-अंशकी विभाषा इस प्रकार है-दर्शनमोहके उपशामकका परिणाम अत्यन्त विशुद्ध होता है, क्योकि वह इसके अन्तर्मुहूर्त पूर्वसे ही अनन्तगुणी विशुद्धिसे विशुद्ध होता हुआ आरहा है ॥३-८॥ विशेषार्थ-दर्शनमोहनीय कर्मके उपशमन करनेके लिए उद्यत जीव अधःप्रवृत्तकरण करनेके अन्तमुहूर्त पूर्वसे ही अनन्तगुणी विशुद्धिके द्वारा अन्तमुहूर्ततक निरन्तर वृद्धिगत विशुद्धिवाला होता है। इसका कारण यह है कि अति दुस्तर, मिथ्यात्व गतसे अपना उद्धार करनेके लिए उद्यत, अलब्ध-पूर्व सम्यक्त्व-रत्नकी प्राप्तिके लिए प्रतिक्षण प्रयत्नशील, क्षयोपशम, देशना आदि लब्धियोकी प्राप्तिके कारण महान् सामर्थ्य से समन्वित और प्रतिसमय संवेग-निर्वेदके द्वारा उपचीयमान हातिरेकसे संयुक्त सातिशय मिथ्यादृष्टिके अनन्तगुणी विशुद्धि अन्तर्मुहूर्त तक प्रतिक्षण होना स्वाभाविक ही है । इस प्रकार यह प्रथम सूत्रगाथाके पूर्वार्धका व्याख्यान है। ____ अब चूर्णिकार प्रथम गाथाके उत्तरार्धके प्रत्येक पदकी विभापा करते है चूर्णिसू०- 'जोग' इस पदकी विभाषा इस प्रकार है-अन्यतर मनोयोगी, अन्यतर वचनयोगी, औदारिककाययोगी या वैक्रियिककाययोगी जीव दर्शनमोहका उपशमन प्रारम्भ
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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