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________________ कसाय पाहुड सुत्त [१० सम्यक्त्व अर्थाधिकार ओरालियकायजोगो वा उब्धियकायजोगो वा । ११. 'कसाए'त्ति विहासा । १२. अण्णदरो कसायो । १३. किं सो वड्डमाणो हायमाणो त्ति ? णियमा हायमाणकसायो । १४. 'उवजोगे' त्ति विहासा । १५. णियमा सागारुवजोगो। १६. 'लेस्सा'त्ति विहासा। १७. तेउ-परम-सुक्कलेस्साणं णियमा वड्डमाणलेस्सा । १८. 'वेदो य को भवे'त्ति विहासा । १९. अण्णदरो वेदो। २०. 'काणि वा पुव्ववद्धाणि'त्ति विहासा । २१. एत्थ पयडिसंतकम्मं द्विदिसंतकम्ममणुभागसंतकम्मं पदेससंतकम्मं च मग्गियव्वं । २२. 'के वा असे णिवंधदित्ति विहासा । २३. एत्थ पयडिबंधो हिदिवंधो अणुभागबंधो पदेसबंधो च मग्गियव्यो । २४. 'कदि आवलियं पविसंति'त्ति विहासा । २५. मूलपयडीओ सव्याओ पविसंति । २६. उत्तरपयडीओ वि जाओ अत्थि ताओ पविसंति । २७. णवरि जइ परभावियाउअमत्थि, तं ण पविसदि । करता है। 'कपाय' इस पदकी विभापा इस प्रकार है-चारों कपायोमेसे किसी एक कषायसे उपयुक्त जीव दर्शनमोहके उपशमका प्रारम्भ करता है ॥९-१२॥ शंका-क्या वह वर्धमान कपाय-युक्त होता है, या हीयमान ? समाधान-नियमसे हीयमान कपाय-युक्त होता है ॥१३॥ चूर्णिसू०-'उपयोग' इस पदकी विभापा इस प्रकार है-दर्शनमोहका उपशामक जीव नियमसे साकारोपयोगी होता है। 'लेश्या' इसकी विभापा इस प्रकार है-दर्शनमोहउपशामकके तेज, पद्म और शुक्ल लेश्याओमेसे नियमसे कोई एक वर्धमान लेश्या होती है । 'कौनसा वेद होता है' इस अन्तिम पदकी विभापा इस प्रकार है-तीनो वेदोमेसे कोई एक वेदवाला जीव दर्शनमोहका उपशामक होता है ॥१४-१९॥ इस प्रकार प्रथम गाथाकी अर्थ विभाषा समाप्त हुई। चूर्णिस०-अब दूसरी गाथाके 'काणि वा पुव्ववद्धाणि' इस प्रथम पदकी विभाषा करते हैं-यहॉपर प्रकृतिसत्कर्म, स्थितिसत्कर्म, अनुभागसत्कर्म और प्रदेशसत्कर्मका अनुमार्गण करना चाहिए । अर्थात् उपशम-सम्यक्त्वको प्राप्त होनेवाले जीवके सत्तायोग्य प्रकृतियोके संभवासंभवका विचार करना चाहिए ॥२०-२१॥ चूर्णिस०-'के वा अंसे णिबंधदि' इस दूसरे पदकी विभाषा करते हैं-इस विषयमें प्रकृतिवन्ध, स्थितिबन्ध, अनुभागबन्ध, और प्रदेशबन्धकी मार्गणा करना चाहिए ॥२२-२३॥ चर्णिस०-'कदि आवलियं पविसंति' इस तीसरे पदकी विभाषा इस प्रकार हैदर्शनमोहका उपशमन करनेवाले जीवके सभी मूल प्रकृतियाँ उदयावलीमे प्रवेश करती हैं । उत्तरप्रकृतियोंमेसे भी जो होती हैं, अर्थात् जिनका सत्त्व पाया जाता है, वे प्रवेश करती हैं, अन्य नहीं । विशेप इतना जानना कि यदि पर-भव-सम्बन्धी आयुका अस्तित्व हो, तो वह उदयावलीमें प्रवेश नहीं करती है ।।२४-२७॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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