SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 722
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १० सम्मत्त अत्याहियारो १. कसायपाहुडे सम्मत्ते त्ति अणि ओगद्दारे अधापवत्तकरणे हमाओ चत्तारि सुत्तगाहाओ परूवेयव्वाओ । २. तं जहा । (३८) दंसणमोह उवसामगस्स परिणामो केरिसो भवे । जागे कसा उवजांगे लेस्सा वेदो य को भवे ॥९१॥ (३९) काणि वा पुव्ववद्धाणि के वा अंसे णिबंधदि । कदि आवलियं पविसंति कदिहं वा पवेसगो ॥ ९२॥ १० सम्यक्त्व - अर्थाधिकार जिनवर गणधरको प्रणमि, समकित में मन लाय । इस सम्यक्त्व - द्वारको, भापूँ अति हर्षाय ॥ चूर्णिसू० - कसायपाहुडके इस सम्यक्त्वनामक अनुयोगद्वारमे अधःप्रवृत्तकरणके विषयमे ये वक्ष्यमाण चार सूत्र - गाथाएँ प्ररूपण करना चाहिए । वे इसप्रकार है ॥१-२॥ दर्शनमोहके उपशामकका परिणाम कैसा होता है, किस योग, कपाय और उपयोग में वर्तमान, किस लेश्यासे युक्त और कौनसे वेदवाला जीव दर्शनमोहका उपशामक होता है ? ॥ ९१ ॥ इस गाथा के द्वारा उपशमसम्यक्त्वके उत्पन्न करनेवाले जीवके चौदह मार्गणा - स्थानोमें संभव भावोके अन्वेषणकी सूचना की गई है, जिसका निर्णय आगे चूर्णिसूत्रोके आधारपर किया जायगा । दर्शनमोहके उपशम करनेवाले जीवके पूर्व बद्ध कर्म कौन-कौनसे हैं और अब कौन-कौन से नवीन कर्माशोंको बाँधता है । उपशामकके कौन-कौन प्रकृतियाँ उदयावलीमें प्रवेश करती हैं और यह कौन - कौन प्रकृतियोंका प्रवेशक है, अर्थात् उदीरणारूपसे उदयावलीमें प्रवेश कराता है ? ||९२|| विशेषार्थ - इस गाथाके प्रथम चरणके द्वारा दर्शनमोहके उपशमसे पूर्ववर्ती प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशसम्बन्धी सत्त्वकी पृच्छा की गई है, क्योंकि, पूर्ववद्ध कर्मको ही सत्त्व कहते है । गाथाके द्वितीय चरणसे नवीन वधनेवाले कर्मों के विषय में प्रश्न किया गया 1 है । तृतीय चरणसे उपशमन - कालमे उदयमें आनेवाले कमोंकी पृच्छा की गई है और अन्तिम 1 चरणसे उस समय किस-किस प्रकृतिको उदीरणा होती है, यह प्रश्न पूछा गया है । इन चारों पृच्छाओका निर्णय आगे चूर्णिसूत्रों द्वारा किया जायगा ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy