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________________ गा० ६९] कषायोपयोग-वर्गणा-विरहिताविरहित-स्थान-निरूपण ५९१ २७३. तदो छट्ठी गाहा समत्ता भवदि । २७४. 'उचजोगवग्गणाहि य अविरहिदं काहि विरहियं वा वि' त्ति एदम्मि अद्धे एको अत्थो, विदिये अद्ध एको अत्थो, एवं दो अत्था । __२७५. पुरिमद्धस्स विहासा । २७६. एत्थ दुविहाओ उवजोगवग्गणाओ कसायउदयट्ठाणाणि च उवजोगद्धट्ठाणाणि च । २७७. एदाणि दुविहाणि वि द्वाणाणि उवजोगवग्गणाओं त्ति वुचंति । २७८. उवजोगद्धट्ठाणेहि ताव केत्तिएहिं विरहिदं, केहि कालमे विशिष्ट उपदेशका अभाव होनेसे वह व्यालीस पद-सम्बन्धी अल्पबहुत्व सम्यक् ज्ञात नहीं है, इसीलिए उसका प्ररूपण नहीं किया गया है। चर्णिसू०-इस प्रकार छठी गाथाकी अर्थ विभापा समाप्त हुई ॥२७३॥ चूर्णिसू०-'कितनी उपयोग-वर्गणाओंसे कौन स्थान अविरहित पाया जाता है, और कौन स्थान विरहित' ? इस गाथाके पूर्वार्धमे एक अर्थ कहा गया है और गाथाके उत्तरार्धमे एक अर्थ । इस प्रकार इस गाथामे दो अर्थ सम्बद्ध है ॥२७४॥ विशेषार्थ-गाथाके पूर्वार्धमें दो प्रकारकी वर्गणाओको लेकर उनमे जीवोसे रहित अथवा भरित ( सहित ) स्थानोकी प्ररूपणा करनेवाला प्रथम अर्थ निवद्ध है । तथा गाथाके उत्तरार्धमें कषायोपयुक्त जीवोकी गतियोंका आश्रय लेकर तीन प्रकारकी श्रेणियोका अल्पबहुत्व सूचित किया गया है । यह दूसरा अर्थ है । इस प्रकारसे इस गाथामे दो अर्थ सम्बद्ध हैं, ऐसा कहा गया है। उपयोग-वर्गणास्थानोंका तथा तीनो प्रकारकी श्रेणियोका वर्णन आगे चूर्णिकार स्वयं करेंगे। चूर्णिसू०-अब इस गाथासूत्रके पूर्वार्धकी अर्थविभाषा की जाती है-इस गाथामें कही गई उपयोगवर्गणाएँ दो प्रकारकी होती हैं-कषायोदयस्थान रूप और उपयोगकाल-स्थान रूप ॥२७५.२७६॥ विशेषार्थ-क्रोधादि प्रत्येक कषायके जो असंख्यात लोकोके प्रदेश-प्रमाण उदयअनुभाग-सम्बन्धी विकल्प हैं, उन्हे कपायोदय-स्थान कहते हैं । क्रोधादि प्रत्येक कषायके जो जधन्य उपयोगकालसे लेकर उत्कृष्ट उपयोगकाल तकके भेद हैं, उन्हे उपयोगकाल-स्थान कहते हैं। चूर्णिसू०-इन दोनो ही प्रकारके स्थानोको 'उपयोगवर्गणा' इस नामसे कहते हैं ॥२७॥ शंका-किन जीवोसे किस गतिमें अविच्छिन्नरूपसे उपयोगकालस्थानोंके द्वारा कौन स्थान विरहित अर्थात् शुन्य पाया जाता है, और कौन स्थान अविरहित अर्थात् परिपूर्ण पाया जाता है ? ॥२७८॥ * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'उवजोगद्धवाणेहि' के स्थानपर 'उवजोगहाणणि' ऐसा पाठ मुद्रित है। (देखो पृ० १६५८) पर वह इसी सूत्रकी टीकाके अनुसार अशुद्ध है।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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