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________________ ५९० __ कसाय पाहुड सुत्त [७ उपयोग अर्थाधिकार २५८. एदेसि वारसण्हं पदाणमप्पाबहुअं । २५९. तं जहा । २६०. लोभोवजुत्ताणं लोभकालो थोवो । २६१. मायोवजुत्ताणं मायकालो अणंतगुणो। २६२. कोहोवजुत्ताणं कोहकालो अणंतगुणो । २६३. माणोवजुत्ताणं माणकालो अणंतगुणो । २६४. लोभोवजुत्ताणं णोलोभकालो अणंतगुणो । २६५. मायोवजुत्ताणं णोपायकालो अणंतगुणो । २६६. कोहोवजुत्ताणं णोकोहकालो अणंतगुणो । २६७. माणोवजुत्ताणं णोमाकालो अणंतगुणो । २६८. माणोवजुत्ताणं मिस्सयकालो अणंतगुणो । २६९. कोहोवजुत्ताणं मिस्सयकालो विसेसाहिओ । २७०. मायोवजुत्ताणं मिस्सयकालो विसेसाहिओ। २७१. लोभोवजुत्ताणं मिस्सयकालो विसेसाहियो । - २७२. एत्तो वादालीसपदप्पाबहुअं कायव्यं । चूर्णिसू०-अव इन बारह स्वस्थानपदोका अल्पबहुत्व कहते हैं। वह अल्पवहुत्व इस प्रकार है वर्तमानसमयमें लोभकपायसे उपयुक्त जीवोके अतीतकालसम्बन्धी लोभका काल सवसे कम है। वर्तमानसमयमें मायाकपायसे उपयुक्त जीवोके अतीतकालसम्बन्धी मायाका काल उपर्युक्त लोभकालसे अनन्तगुणा है। वर्तमानसमयमें क्रोधकषायसे उपयुक्त जीवोके अतीतकालसम्बन्धी क्रोधका काल उपर्युक्त मायाकालसे अनन्तगुणा है। वर्तमानसमयमें मानकषायसे उपयुक्त जीवोके अतीतकालसम्बन्धी मानका काल उपयुक्त क्रोधकालसे अनन्तगुणा है। वर्तमानसमयमें लोभकषायसे उपयुक्त जीवोके अतीतकालसम्बन्धी नोलोभकाल उपयुक्त मानकालसे अनन्तगुणा है। वर्तमानसमयमे मायाकषायसे उपयुक्त जीवोके अतीतकालसम्वन्धी नोमायाकाल उपर्युक्त नोलोभकालसे अनन्तगुणा है। वर्तमानसमयमें क्रोधकषायसे उपयुक्त जीवोके अतीतकालसम्बन्धी नोक्रोधकाल उपर्युक्त नोमायाकालसे अनन्तगुणा है । वर्तमानसमयमें मानकपायसे उपयुक्त जीवोके अतीतकालसम्बन्धी नोमानकाल उपयुक्त नोक्रोधकालसे अनन्तगुणा है। वर्तमानसमयमे मानकपायसे उपयुक्त जीवोके अतीतकालसम्बन्धी मिश्रकाल उपयुक्त नोमानकालसे अनन्तगुणा है । वर्तमानसमयमे क्रोधकषायसे उपयुक्त जीवोके अतीतकालसम्बन्धी मिश्रकाल उपर्युक्त मिश्रकालसे विशेप अधिक है। वर्तमानसमयमें मायाकषायसे उपयुक्त जीवोके अतीतकालसम्बन्धी मिश्रकाल उपर्युक्त मिश्रकालसे विशेष अधिक है । वर्तमानसमयमे लोभकपायसे उपयुक्त जीवोके अतीतकालसम्बन्धी मिश्रकाल उपयुक्त मिश्रकालसे विशेष अधिक है ॥२५८-२७१॥ चूर्णिसू०-इस स्वस्थानपद-सम्बन्धी अल्पबहुत्वकी प्ररूपणाके पश्चात् पूर्वमें बतलाये गये व्यालीस पदोके कालसम्बन्धी अल्पबहुत्वका प्ररूपण करना चाहिए ॥२७२॥ विशेपार्थ-इस सूत्रकी टीका करते हुए जयधवलाकार लिखते हैं कि आज वर्तमान १ एत्तो वादालीसपदणिबद्ध परत्थाणप्याबहुअ पि चिंतिय णेदव्वमिदि वुत्त होइ । त पुण वादालीसपदमप्पाबहुअ संपहियकाले विसिट्ठोवएसाभावादो ण सम्मवगम्मदि त्ति ण तविवरणं कीरदे । जयध°
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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