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________________ ५७८ कसाय पाहुड सुत्त [७ उपयोग-अर्थाधिकार १६४. जहा रइएम, तहा देवेसु । णवरि कोहादो आडवेयन्यो। १६५. तं जहा। १६६. जे असंखेज्जकोहोवांगिगा भवा- ते भवा थोवा । १६७. जे असंखेजमाणोवजोगिगा भवा ते भवा असंखेज्जगुणा । १६८. जे असंखेज्जमायोवजोगिगा भवा ते भवा असंखेज्जगणा । १६९ जे असंखेज्जलोभोवजोगिगा भवा ते भवा असंखेज्जगणा | १७०. जे संखेज्जलोभोवजोगिगा भवा ते भवा असंखेज्जगुणा । १७१. जे संखेज्जमायोवजोगिगा भवा ते भवा विसेसाहिया । १७२. जे संखेज्जमाणोवजोगिगा भवा ते अवा विसेसाहिया । १७३. जे संखेज्जकोहोवजोगिगा भवा ते भवा विसेसाहिया । १७४ विदियगाहाए अत्थविहासा समत्ता । १७५ 'उवजोगवग्गणाओ कम्हि कसायम्हि केत्तिया होति' त्ति एसा सव्वा विगाहा पुच्छासुत्तं' । १७६. तस्स विहासा । १७७. तं जहा । १७८. उवजोग - चूर्णिसू-जिस प्रकारसे नारकियोमे आठ पद-सम्बन्धी अल्पवहुत्वका कथन किया है, उसी प्रकारसे देवोम भी अल्पबहुत्वका कथन जानना चाहिए । विशेष बात यह है कि देवोके अल्पवहुत्व कहते समय क्रोधकपायसे कथन प्रारम्भ करना चाहिए। वह इस प्रकार है-देवोमें जो असंख्यात क्रोधकपायसम्बन्धी उपयोगवाले भव हैं, वे भव सबसे कम होते हैं। जो मानकपायसम्बन्धी उपयोगवाले असंख्यात भव हैं, वे भव क्रोधकपायके उपयोगवाले भवोंसे असंख्यातगुणित होते हैं। जो असंख्यात मायाकपाय-सम्बन्धी उपयोगवाले भव हैं, वे भव मानकपायके उपयोगवाले भवोसे असंख्यातगुणित हैं। जो असंख्यात लोभकषायसम्बन्धी उपयोगवाले भव हैं, वे भव मायाकपायके उपयोगवाले भवोसे असंख्यातगुणित हैं । जो संख्यात लोभकपायसम्बन्धी उपयोगवाले भव है, वे भव असंख्यात लोभकपायके उपयोगवाले भवोसे असंख्यातगुणित हैं। जो संख्यात मायाकपायसम्बन्धी उपयोगवाले भव हैं, वे भव संख्यात लोभकपायसम्बन्धी उपयोगवाले भवोसे विशेप अधिक हैं। जो संख्यात मानकपायसम्बन्धी उपयोगवाले भव है, वे भव संख्यात मायाकपायके उपयोगवाले भवोसे विशेए अधिक हैं। जो संख्यात क्रोधकपायसम्बन्धी उपयोगवाले भव हैं, वे भव संख्यात मानकपायके उपयोगवाले भवोसे विशेष अधिक हैं। इस प्रकार द्वितीय गाथाकी अर्थविभापा समाप्त हुई ॥१६४-१७४॥ चूर्णिसू०-'उपयोग-वर्गणाएँ किस कषायमे कितनी होती हैं। यह समस्त गाथा पृच्छासूत्र है । अर्थात् इससे क्रोधादिकपाय-विपयक उपयोगवर्गणाओका ओघ और आदेशसे प्रमाण पूछा गया है। उसकी विभापा कहते हैं। वह इस प्रकार है-उपयोगवर्गणाएँ १ तत्थ गाहापुबद्धेण 'उवजोगवग्गणाओ कम्हि कसायम्हि केत्ता होति' ति ओघेण पुच्छाणिदेतो को । पच्छद्रेण वि 'कदरिस्मे च गदीए केवडिया वग्गणा होति' त्ति आदेमविसया पुच्छा णिद्दिट्टा त्ति दट्ठव्वा; गदिमग्गणाविसयत्सेदस्स पुच्छाणिद्दे सत्स सेसासेसमग्गणाण टेसामासयमावेणावट्ठाणदम णादो | जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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