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________________ गा० ६९] कषायोपयोगकाल-अल्पबहुत्व-निरूपण ५४. बादरेइ दिय-अपजत्तयस्स उकस्सिया माणद्धा संखेज्जगुणा । ५५.उकास्सिया कोधद्धा विसेसाहिया । ५६. उक्कस्सिया मायद्धा विसेसाहिया । ५७. उक्कस्सिया लोभद्धा विसेसाहिया । ५८. सुहमपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया माणद्धा संखेज्जगुणा । ५९. उक्कस्सिया कोघद्धा विसेसाहिया । ६०. उक्कस्सिया मायद्धा विसेसाहिया । ६१. उक्कस्सिया लोभद्धा विसेसाहिया। ६२. बादरेइ दियपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया माणद्धा संखेज्जगुणा । ६३. उक्कस्सिया कोधद्धा विसेसाहिया । ६४. उक्कस्सिया मायद्धा विसे साहिया । ६५. उक्कस्सिया लोभद्धा विसेसाहिया । ६६ बेइं दिय-अपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया माणद्धा संखेज्जगुणा । ६७. तेई दियअपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया माणद्धा विसेसाहिया । ६८. चउरिदिय-अपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया माणद्धा विसेसाहिया।६९.वेइंदिय-अपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया कोधद्धा विसेसाहिया। चूर्णिसू०-बादर एकेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्त जीवके मानका उत्कृष्टकाल सूक्ष्मलध्यपर्याप्त निगोदिया जीवके उत्कृष्ट लोभकालसे संख्यातगुणा है। उसी वादर एकेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्त जीवके क्रोधका उत्कृष्टकाल उसीके उत्कृष्ट मानकालसे विशेष अधिक है। उसी वादर एकेन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके लोभका उत्कृष्टकाल उसीके उत्कृष्ट मायाकालसे विशेष अधिक है ॥५४-५७॥ चूर्णिस०-सूक्ष्मपर्याप्त एकेन्द्रिय जीवके मानका उत्कृष्टकाल बादर एकेन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट लोभकालसे संख्यातगुणा है। उसी सूक्ष्मपर्याप्त एकेन्द्रियके क्रोधका उत्कृष्टकाल उसीके उत्कृष्ट मानकालसे विशेष अधिक है । उसी सूक्ष्मपर्याप्त एकेन्द्रियके मायाका उत्कृष्टकाल उसीके उत्कृष्ट क्रोधकालसे विशेष अधिक है। उसी सूक्ष्मपर्याप्त एकेन्द्रियके लोभका उत्कृष्टकाल उसीके उत्कृष्ट मायाकालसे विशेष अधिक है ॥५८-६१॥ चूर्णिसू०-बादर एकन्द्रियपर्याप्त जीवके मानका उत्कृष्टकाल सूक्ष्मपर्याप्त एकेन्द्रिय जीवके उत्कृष्ट लोभकालसे संख्यातगुणा है। उसी वादर एकेन्द्रियपर्याप्त जीवके क्रोधका उत्कृष्ट काल उसीके उत्कृष्ट मानकालसे विशेष अधिक है । उसी वादर एकेन्द्रियपर्याप्त जीवके मायाका उत्कृष्टकाल उसीके उत्कृष्ट क्रोधकालसे विशेष अधिक है । उसी वादर एकेन्द्रियपर्याप्त जीवके लोभका उत्कृष्टकाल उसीके उत्कृष्ट मायाकालसे विशेष अधिक है ॥६२-६५॥ चूर्णिसू०-द्वीन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके मानका उत्कृष्टकाल बादर एकेन्द्रियपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट लोभकालसे संख्यातगुणा है। त्रीन्द्रियलव्ध्यपर्याप्त जीवके मानका उत्कृष्टकाल द्वीन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट मानकालसे विशेष अधिक है। चतुरिन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके मानका उत्कृष्टकाल श्रीन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट मानकालसे विशेष अधिक है। द्वीन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके क्रोधका उत्कृष्टकाल चतुरिन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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