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________________ • ५६४ फलाय पाहुड सुच्च [७ उपयोग-अर्थाधिकार चेव उक्कस्सिया कोधद्धा विसेसाहिया । ४१. तेसिं चेव उक्कस्सिया मायद्धा विसेसाहिया ४२. तेसिं चेव उक्कस्सिया लोभद्धा विसेसाहिया । ४३. णिरयगदीए उक्कस्सिया कोधद्धा संखेज्जगुणा । ४४. देवगदीए उक्कस्सिया लोभद्धा विसेसाहिया । ४५. तेसिं चेव उवदेसेण चोदस-जीवसमासेहिं दंडगो भणिहिदि । ४६. चोदसण्हं जीवसमासाणं देव-णेरइयवज्जाणं जहणिया पाणद्धा तुल्ला थोवा । ४७.जहणिया कोधद्धा विसेसाहिया । ४८. जहणिया मायद्धा विसेसाहिया । ४९. जहणिया लोभद्धा विसे साहिया । ५०. सुहुमस्स अपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया माणद्धा संखेज्जगुणा । ५१.उक्कस्सिया कोधद्धा विसेसाहिया। ५२. उक्कस्सिया मायद्धा विसेसाहिया। ५३. उक्कस्सिया लोभद्धा विसेसाहिया। कालसे संख्यातगुणा है। उन्हींके क्रोधका उत्कृष्टकाल उन्हींके उत्कृष्ट मानकालसे विशेष अधिक है। उन्हीं मनुष्य-तिर्यंचयोनियोके मायाका उत्कृष्टकाल उन्हींके उत्कृष्ट क्रोधकालसे विशेष अधिक है। उन्हीं मनुष्य-तिर्यंचयोनियोके लोभका उत्कृष्टकाल उन्हींके उत्कृष्ट मायाकालसे विशेष अधिक है। नरकगतिमें क्रोधका उत्कृष्टकाल मनुष्य-तिर्यंचयोनियोके उत्कृष्ट लोभकालसे संख्यातगुणा है। देवगतिमें लोभका उत्कृष्टकाल नरकगतिके उत्कृष्ट क्रोधकालसे विशेष अधिक है ।।३९-४४॥ चूर्णिसू०-अव प्रवाह्यमान उपदेशके अनुसार चौदह जीवसमासोके द्वारा जघन्य और उत्कृष्ट पद-विशिष्ट कपायोके कालसम्वन्धी अल्पवहुत्व-दंडकको कहते हैं-देव और नारकियोसे रहित शेप चौदह जीवसमासोके मानका जघन्य काल परस्परमे समान होकरके भी वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा सबसे कम है। उन्ही देव-नारकी-रहित चौदह जीवसमासोंके क्रोधका जघन्यकाल उन्हींके जघन्य मानकालसे विशेप अधिक है। उन्हीं देव-नारकी-रहित चौदह जीवसमासोके मायाका जघन्यकाल उन्हीके जघन्य क्रोधकालसे विशेप अधिक है। उन्हीं देव-नारकी-रहित चौदह जीवसमासोके लोभका जघन्य काल उन्हीके जघन्य मायाकालसे विशेष अधिक है ॥४५-४९।। चूर्णिसू-सूक्ष्म लब्ध्यपर्याप्त निगोदियाके मानका उत्कृष्टकाल देव-नारकी-रहित चौदह जीवसमासोंके जघन्य लोभकालसे संख्यातगुणा है। सूक्ष्म लब्ध्यपर्याप्त निगोदियाके क्रोधका उत्कृष्टकाल उन्हीके उत्कृष्ट मानकालसे विशेष अधिक है । उन्हीं सूक्ष्म लब्ध्यपर्याप्त निगोदियाके मायाका उत्कृष्टकाल उन्हीके उत्कृष्ट क्रोधकालसे विशेप अधिक है । उन्हीं सूक्ष्म लब्ध्यपर्याप्त निगोदियाके लोभका उत्कृष्ट काल उन्हींके उत्कृष्ट मायाकालसे विशेप अधिक है ॥५०-५३॥ १ तेसि चेव भयवताणमजमवु णागहत्थीण पवाइजतेणुवएसेण चोद्दसजीवसमासेसु जहणुक्कस्सपदविसेसिदो अन्याबहुअदडओ एत्तो भणिहिदि भणिज्यत इत्यर्थः । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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