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________________ कसाय पाहुड सुस्त [७ उपयोग अर्थाधिकार ७०. तेइं दिय-अपज्जत्तयस्स उकस्सिया कोधद्धा विसेसाहिया । ७१. चउरिदियअपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया कोधद्धा विसेसाहिया । ७२. बेइदिय-अपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया मायद्धा विसेसाहिया । ७३. तेइ दियअपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया मायद्धा विसेसाहिया । ७४. चउरिदिय-अपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया मायद्धा विसेसाहिया ।। ७५. वेइंदिय-अपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया लोभद्धा विसेसाहिया । ७६. तेइ दियअपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया लोभद्धा विसेसाहिया । ७७. चदुरिंदिय-अपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया लोभद्धा विसेसाहिया । ७८. वेइं दियपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया माणद्धा संखेज्जगुणा । ७९ तेइ दियपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया माणद्धा विसेसाहिया । ८०. चउरिंदियपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया माणद्धा विसेसाहिया । ८१. वेई दियपज्जत्तयस्स उक्कस्सिया कोधद्धा विसेसाहिया । ८२. तेइ दियमानकालसे विशेष अधिक है। त्रीन्द्रियलव्ध्यपर्याप्त जीवके क्रोधका उत्कृष्टकाल द्वीन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट क्रोधकालसे विशेष अधिक है। चतुरिन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्त जीवके क्रोधका उत्कृष्टकाल त्रीन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट क्रोधकालसे विशेष अधिक है ॥६६-७१॥ चूर्णिसू०-द्वीन्द्रियलव्ध्यपर्याप्त जीवके मायाका उत्कृष्टकाल चतुरिन्द्रियलव्ध्यपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट क्रोधकालसे विशेष अधिक है। त्रीन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके मायाका उत्कृष्टकाल द्वीन्द्रियलब्ध्यपर्याप्तके उत्कृष्ट मायाकालसे विशेष अधिक है। चतुरिन्द्रियलव्ध्यपर्याप्त जीवके मायाका उत्कृष्टकाल त्रीन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट मायाकालसे विशेष अधिक है ॥७२-७४॥ चूर्णिसू०-द्वीन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके लोभका उत्कृष्टकाल चतुरिन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट मायाकालसे विशेप अधिक है। श्रीन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके लोभका उत्कृष्टकाल द्वीन्द्रियलव्ध्यपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट लोभकालसे विशेष अधिक है। चतुरिन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके लोभका उत्कृष्टकाल त्रीन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट लोभकालसे विशेष अधिक है ॥७५-७७॥ चूर्णिमू०-द्वीन्द्रियपर्याप्त जीवके मानका उत्कृष्टकाल चतुरिन्द्रियलब्ध्यपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट लोभकालसे संख्यातगुणा है। त्रीन्द्रियपर्याप्त जीवके मानका उत्कृष्टकाल द्वीन्द्रियपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट मानकालसे विशेप अधिक है । चतुरिन्द्रियपर्याप्त जीवके मानका उत्कृष्टकाल त्रीन्द्रियपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट मानकालसे विशेप अधिक है ॥७८-८०॥ चूर्णिसू०-द्वीन्द्रियपर्याप्त जीवके क्रोधका उत्कृष्टकाल चतुरिन्द्रियपर्याप्त जीवके उत्कृष्ट मानकालसे विशेप अधिक है। त्रीन्द्रियपर्याप्त जीवके क्रोधका उत्कृष्टकाल द्वीन्द्रिय
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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