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________________ ५५८ कसाय पाहुड सुत्त - [७ उपयोग-अर्थाधिकार (१३) एकम्हि य अणुभागे एक्ककसायम्मि एक्ककालेण । उवजुत्ता का च गदी विसरिसमुवजुजदे का च ॥६६॥ (१४) केवडिया उवजुत्ता सरिसीसु च वग्गणा कमाएसु । केवडिया च कसाए के के च विसिस्सदे केण ॥६॥ कितनी वर्गणाएँ होती है, इस पृच्छाके द्वारा उक्त दोनो ही वर्गणाओके प्रमाणको आदेशप्ररूपणा सूचित की गई है। एक अनुभागमें और एक कपायमें एक कालकी अपेक्षा कौन सी गति सदृशरूपसे उपयुक्त होती है और कौन-सी गति विसदृशरूपसे उपयुक्त होती है ? ॥६६॥ विशेषार्थ-अनुभाग-संजावाले एक ही कपायमे एक ही समयकी अपेक्षा कौन गति होती है, अर्थात् किस गतिमे सभी जीव क्रोधादि कपायोमेसे किसी एक कषायमे एक समयकी अपेक्षा उपयुक्त पाये जाते है ? इसी प्रकार दो, तीन अथवा चार कपायोमें भी एक ही समयकी अपेक्षा कौन गति उपयुक्त अथवा अनुपयुक्त पाई जाती है। यह 'अप्रवाह्यमान'–परम्पराके अनुसार अर्थ है । 'प्रवाह्यमान'–परम्पराके उपदेशानुसार कपाय और अनुभाग इन दोनोमे भेद है । तदनुसार एक 'अनुभागमे' ऐसा कहने पर 'एक कपायउदयस्थानमे' यह अर्थ लेना चाहिए। तथा, 'एक कालसे' ऐसा कहने पर एक समयसम्बन्धी एक उपयोग-वर्गणाका ग्रहण करना चाहिए । अतएव यह अर्थ हुआ कि क्रोधादि कषायोंमेंसे एक-एक कपायके असंख्यात लोकमात्र कपाय-उदयस्थान होते है और संख्यात आवलीप्रमाण कपाय-उपयोगस्थान होते है। उनमेसे एक कपायका एक कपाय-उदयस्थानमे और एक कपाय-उपयोगस्थानमे, विवक्षित एक समयमे ही कौन गति उपयुक्त होती है ? अर्थात् क्या सभी जीवोके एक ही वार उक्त प्रकारके परिणाम सम्भव है, अथवा नहीं ? इस प्रकारकी पृच्छा की गई है । 'विसरिसमुवजुज्जदे का च' ऐसा कहने पर दो कषायउदयस्थानोमे, तीन कपाय-उदयस्थानोमे अथवा चार कपाय-उदयस्थानोमे, इस प्रकार संख्यात और असंख्यात कषाय-उदयस्थानोमे एक ही कालकी अपेक्षा कौन गति उपयुक्त होती है ? उसी समय दो कालोपयोग-वर्गणाओसे, अथवा तीन कालोपयोग-वर्गणाओसे, इस प्रकार संख्यात और असंख्यात कालोपयोग-वर्गणाओंसे प्रतिबद्ध पूर्वोक्त कपाय उदयस्थानोकी अपेक्षा एक ही वार उपयुक्त कौन गति होती है ? इस प्रकार यह चौथी गाथा दो प्रकारके अर्थोंसे सम्बद्ध है । इन पृच्छाओंका समाधान आगे चूर्णिसूत्रोके द्वारा किया जायगा। सदृश कपाय-उपयोगवर्गणाओंमें कितने जीव उपयुक्त हैं, तथा चारों कपायोंसे उपर्युक्त सर्व जीवोंका कौन-सा भाग एक एक कपायमें उपयुक्त है और किस किस कपायसे उपयुक्त जीव कौन-कौनसी कपायोंसे उपयुक्त जीवराशिके साथ गुणकार और भागहारकी अपेक्षा हीन अथवा अधिक होते हैं ? ॥६७॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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