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________________ गा० ६२] अनुभागापेक्षया वन्धादि-पंचपद-अल्पबहुत्व-निरूपण ५४५ अणुभागबंधो थोवो' । ५८५. जहण्णयो उदयो उदीरणा च अणंतगुणाणि । ५८६. जहण्णगो अणुभागसंकमो संतकम्मं च अणंतगुणाणि । ५८७ सम्मत्तस्स जहण्णयमणुभागसंतकम्ममुदयो च थोवाणि । ५८८. जहणिया अणुभागुदीरणा अणंतगुणा । अपेक्षा सबसे कम है । ( क्योकि, यहॉपर संयमके ग्रहण करनेके अभिमुख चरमसमयवर्ती मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयतके उत्कृष्ट विशुद्धिसे बद्ध जघन्य अनुभागका ग्रहण किया गया है । ) मिथ्यात्व और बारह कषायोंके जघन्य अनुभागबन्धसे उन्हींके जघन्य उदय और उदीरणा अनन्तगुणित है। ( क्योकि, यहॉपर संयमाभिमुख चरम समयवर्ती मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयतके बद्ध नवीन जघन्य बन्धके समकाल ( साथ ) ही पुरातन बद्ध सत्कर्मोंका भी उदय और उदीरणा होनेसे अनन्तगुणितता देखी जाती है। ) मिथ्यात्व और बारह कषायोंके जघन्य अनुभाग-उदयसे उन्हीके जघन्य अनुभाग-संक्रम और जघन्य अनुभाग-सत्कर्म अनन्तगुणित हैं ॥५८३-५८६॥ विशेषार्थ-इसका कारण यह है कि मिथ्यात्व और अप्रत्याख्यानावरणादि आठ कपायोके सूक्ष्म एकेन्द्रिय-सम्बन्धी हतसमुत्पत्तिक जघन्य अनुभागको विषय करनेसे, तथा अनन्तानुबन्धी कषायोके विसंयोजनापूर्वक संयोजनाके प्रथम समय होनेवाले जघन्य नवक वंधको विषय करनेसे उनके अनन्तगुणितपना देखा जाता है। चूर्णिसू०-सम्यक्त्वप्रकृतिका जघन्य अनुभाग सत्कर्म और जघन्य उदय वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा सबसे कम है ॥५८७॥ विशेषार्थ-इसका कारण यह है कि यहॉपर प्रतिसमय अपवर्तनाघातसे सम्यक्त्वप्रकृतिका भलीभाँति घात करके स्थित कृतकृत्यवेदक सम्यग्दृष्टिके चरम समयमे होनेवाले उदय और सत्कर्मकी विवक्षा की गई है। चूर्णिसू०-सम्यक्त्वप्रकृतिके जघन्य अनुभाग सत्कर्म और उदयसे उसीकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा अनन्तगुणी है ।।५८८॥ १ कुदो; मिच्छत्ताणताणुबधीण सजमाहिमुहचरिमसमयमिच्छाइट्ठिणा सबुक्कस्सविसोहीए वद्धजहण्णाणुभागग्गहणादो । अपञ्चक्खाण-पञ्चक्खाणकसायाण पि सजमाहिमुहचरिमसमयअसजदसम्माइटिठ-सजदासजदाणमुक्कस्स-विसोहिणिबधणाणुभागबधम्मि जहष्णसामित्तावलबणादो । जयघ० । २ किं कारण, सजमाहिमुहचरिमसमयमिच्छाइट्ठि-असजद-सजदासजदेसु जहण्णवधेण समकालमेव पत्तजहण्णभावाण पि उदयोदीरणाण चिराणसतसरूवेण तत्तो अणतगुणत्तदसणादो । जयध० ३ किं कारण, मिच्छत्त-अठकसायाण सुहुमेइंदियहदसमुप्पत्तियजहण्णाणुभागविसयत्तेण अणताणुवधीण पि विस जोयणापुव्वसजोगपढमसमयजहण्णणवकवधविसयत्तण सकमसतकम्माण जहण्णसामित्तावलंबणादो । जयघ० ४ कुदो, अणुसमयोवणाघादेण सुट्ठ घाद पावियूण दिठदकदकरणिज्जचरिमसमयजहण्णाणुभागसरूवत्तादो । जयव० ५ किं कारण; हेट्टा समयाहियावलियमेत्तमोसरिदूण पडिलद्धजहण्णभावत्तादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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