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________________ ५४४ कलाय पाहुड सुत्त [६ वेदक-अर्थाधिकार ५७६. जहण्णओ हिदि-उदयो विसेसाहिओ'। ५७७. एत्तो अणुभागेहिं अप्पाबहुअं ५७८. उक्कस्सेण ताव । ५७९. मिच्छत्त-सोलसकसाय-णवणोकसायाणमुक्कस्स-अणुभागउदीरणा उदयो च थोवा । ५८०. उक्कस्सओ बंधो संकमो संतकम्मं च अणंतगुणाणि ।। ५८१. सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमुक्कस्स-अणुभागउदओ उदीरणा च थोवाणि । ५८२. उक्कस्सओ अणुभागसंकमो संतकम्मं च अणंतगुणाणि । ५८३. एत्तो जहण्णयमप्पाबहुअं । ५८४. मिच्छत्त-बारसकसायाणं जहण्णगो भागसे हीन चार वटे सात (3) सागरोपम है । ) हास्यादिपटककी जघन्य स्थिति-उदीरणासे उन्हींका जघन्य स्थिति-उदय ( एक स्थितिसे ) विशेष अधिक है ।।५७३-५७६।। इस प्रकार जघन्य स्थिति-विपयक अल्पवहुत्व समाप्त हुआ। चूर्णिसू०-अब इससे आगे अनुभागकी अपेक्षा अल्पबहुत्व कहेगे। उसमे पहले उत्कृष्टकी अपेक्षा वर्णन करते हैं । मिथ्यात्व, सोलह कषाय और नव नोकषायोकी उत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणा और उत्कृष्ट उदय वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा सबसे कम है। ( क्योकि, उत्कृष्ट अनुभाग वन्ध और उत्कृष्ट अनुभाग-सत्कर्मके अनन्तवे भागकी ही सर्वदा उदय और उदीरणारूप प्रवृत्ति देखी जाती है । ) मिथ्यात्वादिके उत्कृष्ट उदय और उदीरणासे उन्हीका उत्कृष्ट अनुभागवन्ध, उत्कृष्ट अनुभाग-संक्रम और उत्कृष्ट अनुभाग-सत्कर्म अनन्तगुणा है। ( क्योकि, यहॉपर मिथ्यादृष्टिके सर्वोत्कृष्ट संक्लेशसे बंधे हुए उत्कृष्ट अनुभागको निरवशेषरूपसे ग्रहण किया गया है । ) ॥५७७-५८०॥ चूर्णिसू०-सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वका उत्कृष्ट अनुभाग-उदय और उत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणा वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा सवसे कम हैं । (क्योकि, इनके उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्मके चरम स्पर्धकसे अनन्तगुणित हीन-स्वरूपसे ही सर्वकाल उदय और उदीरणाकी प्रवृत्ति देखी जाती है । ) सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभाग-उदय और उदीरणासे उन्हींका उत्कृष्ट अनुभाग-संक्रम और उत्कृष्ट अनुभाग-सत्कर्म अनन्तगुणित है । ( क्योकि, विना किसी विघातके स्थित उत्कृष्ट अनुभागको यहाँ ग्रहण किया गया है ।) ।।५८१-५८२॥ चूर्णिसू०-अव इससे आगे अनुभाग-सम्बन्धी जघन्य अल्पबहुत्वको कहते हैंमिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी आदि बारह कपायोका जघन्य अनुभागवन्ध वक्ष्यमाण पदोकी १ केत्तियमेत्तो विसेसो ? एगहिदिमेत्तो । जयध० । २ कुदो; उक्कत्सागुभागबधसतकम्माणमण तिमभागे चेव सव्यकालमुदयोदीरणाणं पत्तिदसणादो । ३ कुदो; सण्णिपचिंदियमिच्छाइट्ठिस्स सबुक्कससकिलेसेण वधुकरसाणुभागत्स अणूणाहियस्स गहणादो । जयध० ४ कुदो; एदेसिमुक्कत्साणुभागसंतकम्मचरिमफद्द यादो अणतगुणहीणफद्द यसरूवेण मध्यसमुदयोदीर. णाण पत्तिदसणादो | जयध० ५ कृदो; किंचि वि घादमपावेदूण दिसगुणत्साणुभागसरुवेण पत्तुपरसभावत्तादो । नयधः जयघ
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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