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________________ ५४६ कसाय पाहुड सुत्त [६ वेदफ-अर्थाधिकार ५८९. जहण्णो अणुभागसंकमो अणंतगुणो'। ५९०. सम्मामिच्छत्तस्स जहण्णगो अणुभागसंकमो संतकम्मं च थोवाणि। ५९१. जहण्णगो अणुभाग-उदयो उदीरणा च अणंतगुणाणि । ५९२. कोहसंजलणस्स जहण्णगो अणुभागबंधो संकमो संतकम्मं च थोवाणि । ५९३. जहण्णाणुभाग-उदयो विशेपार्थ-इसका कारण यह है कि कृतकृत्यवेदक होनेसे एक समय अधिक आवली काल पहले सम्यक्त्वप्रकृतिकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा होती है। चूर्णिस०-सम्यक्त्वप्रकृतिकी जघन्य अनुभाग-उदीरणासे उसीका जघन्य अनुभाग संक्रम अनन्तगुणा है ॥५८९।। विशेषार्थ-इसका कारण यह है कि यद्यपि जघन्य उदीरणाके विषयमें ही अपवर्तनाके वशसे जघन्य अनुभागका संक्रम हुआ है, तथापि उस जघन्य अनुभाग-उदीरणासे यह जघन्य अनुभाग-संक्रम अनन्तगुणा है। क्योकि, अपकृष्यमाण अनुभागके अनन्तवें भागस्वरूपसे ही उदय और उदीरणाकी संक्रममे प्रवृत्ति देखी जाती है। चूर्णिसू०-सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य अनुभागसंक्रम और जघन्य अनुभाग-सत्कर्म वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा सबसे कम हैं ॥५९०॥ विशेपार्थ-इसका कारण यह है कि दर्शनमोहका क्षपण करनेवाले जीवके अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण परिणामोके द्वारा सम्यग्मिथ्यात्वका भलीभॉति घात करके स्थित चरम अनुभागखंडको यहाँ ग्रहण किया गया है । ____चूर्णिम०-सम्यग्मिथ्यात्वके जघन्य अनुभागसंक्रम और जघन्य अनुभाग-सत्कर्मसे उसीके जघन्य अनुभाग उदय और जघन्य अनुभाग-उदीरणा अनन्तगणित है ॥५९१॥ विशेषार्थ-क्योकि, घातके विना सम्यक्त्वके अभिमुख चरम समयवर्ती सम्यग्मिथ्याष्टिक तत्प्रायोग्य उत्कृष्ट विशुद्धिके द्वारा उदीर्यमाण जघन्य अनुभागकी यहाँ विवक्षा की गई है। चूर्णिसू०-संज्वलनक्रोधका जघन्य अनुभागबन्ध, जघन्य संक्रम, और जघन्य सत्कर्म ये तीनो परस्परमे समान होकरके भी वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा सबसे कम हैं। १ जइ वि जहण्णोदीरणाविसये चेव ओकदुणावसेण जहण्णाणुभागसकमो जादो, तो वि तत्तो एसो अणतगुणो । किं कारण; ओकडिजमाणाणुभागस्स अणतभागसरुवेण उदयोदीरणाणं तत्य पवुत्तिदसणादो । जयध० २ कुदो; दसणमोहक्खवय-अपुवाणियट्टिकरणपरिणामेहि सुछ धादं पावेयूण ठ्ठिदचरिमाणुभागखंडयविसयत्त ण पडिलद्धजहण्णभावत्तादो । जयध० ३ कुदो; घादण विणा सम्मत्ताहिमुहचरिमसमयसम्मामिच्छाइटिस तप्पाओग्गुफात्सविसाहीए उदीरिजमाणजहण्णाणुभागविसयत्तण पयदहाणसामित्तावलंबणादो। जयध० ४ कुदा; कोधवेदगचरिमसमयजहष्णाणुभागबंधविसयतण तिण्हमेदेसि जहष्णसामित्तोवलमादो। जयध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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