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________________ कसाय पाहुड सुत्त [ ६ वेदक अर्थाधिकार ५२९. जहणेण मिच्छत्तस्स एगा हिंदी उदीरिज्जदि, उदयो संतकम्मं च श्रोणि । ५३०. जट्टिदि उदयो च तत्तियो चेव । ५३१. जडिदि संतकम्मं संखेज्ज - गुणं । ५३२. जडिदि उदीरणा असंखेज्जगुणा । ५३३. जण्णओ द्विदिसंत कम्मो असंखेज्जगुणो" । ५३४ जहण्णओ ट्ठिदिबंधो असंखेज्जगुणो । ε ५३८ चूर्णिसू० - जयन्यकी अपेक्षा मिथ्यात्वकी एक स्थिति उदीरणाको प्राप्त होती है, स्थितिप्रमाण है । ( अतः ये तीनो एक सवसे कम है ।) मिध्यात्वका जघन्य जघन्य यत्स्थितिक उदयसे यत्स्थितिक उदय भी एक स्थितिप्रमाण है और सत्कर्म भी एक स्थितिमात्र होकरके भी वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा यत्स्थितिक उदय भी तत्प्रमाण ही है । मिध्यात्व के सत्कर्म संख्यातगुणा है ॥ ५२९-५३१ ॥ विशेषार्थ - मिथ्यात्व के जघन्य यत्स्थितिक - उदयसे यत्स्थितिक सत्कर्मके संख्यातगुणित कहनेका कारण यह है कि एक स्थितिकी अपेक्षा दो समय सम्बन्धी स्थिति दुगुनी होती है । विवक्षित प्रकृतिकी संक्रमणकालमे जो स्थिति होती है, उसे 'यत्स्थिति' कहते हैं । वह 'यत्स्थिति' जिसके पाई जावे, उसे 'यत्स्थितिक' कहते है । इस प्रकारके यत्स्थितिके उदयको 'यत्स्थितिक-उदय', उदीरणाको 'यत्स्थितिक - उदीरणा' और सत्कर्मको 'यत्स्थितिक सत्कर्म' कहते हैं । आगे भी सर्वत्र 'जट्ठिति' पढ़से 'यत्स्थिति' का ही अर्थ ग्रहण करना चाहिए । चूर्णिसू०-मिथ्यात्वके यत्स्थितिक सत्कर्मसे उसीकी यत्स्थितिक उदीरणा असंख्यातगुणी है ॥ ५३२॥ 1 विशेषार्थ-क्योकि, उसका प्रमाण एक समय अधिक आवलीप्रमाण है । असंख्यात समयोकी एक आवली होती है, अतः इसके असंख्यातगुणित होना सिद्ध है । चूर्णिम० - मिध्यात्वकी यत्स्थितिक - उदीरणासे उसीका जघन्य स्थितिक-सत्कर्म असंख्यातगुणा है ।। ५३३॥ विशेषार्थ - क्योकि, इसका प्रभाग पल्योपमके असंख्यातवें भाग है । | चूर्णिसू० - मिथ्यात्व के जघन्य स्थिति-सत्कर्मसे उसीका जघन्य स्थितिवन्ध असंख्यात - गुणा है ॥ ५३४ ॥ १ त जहा - उदीरणा ताव पढमसम्मत्ताभिमुहमिच्छाइट्ठिस्स समयाहियावलियमेत्तमिच्छत्तपढमट्ठिदीए सेसाए एगट्टिदिमेत्ता होवूण जहणिया होई । उदयो वि तस्सेवा वलियपविट्ठपढमट्ठदियत्स जहणओ होइ । सतक्रम्म पुण दंसणमोहक्खवगस्स एट्ठिदिदुसमयकालमेत्तमिच्छत्तट्ठिदिसतकम्म घेत्तू जहण्णयं होइ । तदो मिच्छत्तस्स जहण्णिया ठिदि उदीरणा उदयो सतकम्म च एर्गादिमेत्ताणि होण थोवाणि जादाणि । जयघ० २ किं कारण; मिच्छत्तपढमलिदीए आवलियपविट्ठाए आवलियमेत्तकाल जहणओ ट्रिट्ठदि-उदओ होइ । तत्थ जठिदि उदयो वि तत्तियो चेव, तम्हा जठिदि उदयो तत्तियो चेवेत्ति भणिद । जयघ० ३ किं कारण; एगट्ठदीदो दुसमयकालट्ठिदीए दुगुणत्तुवलभादो | जयध० ४ कुदो; समयाहियावलियपमाणत्तादो । जयध० ५ कुदो; पलिदोवमस्स असखेनदिभागपमाणत्तादो | जयध० ६ किं कारण, सव्वविसुद्ध बादरेइ दियपनत्तत्स पाल्दोवमासंखेजभागपरिक्षीणसागरोचममेत्तजद्दष्णटिदिनंघग्गणादो । जयध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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