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________________ ५३३ गा० ६२] प्रकृत्यपेक्षया बन्धादि-पंचपद-अल्पबहुत्व-निरूपण पंचण्हं पदाणं उकस्समुक्कस्सेण जहणं जहण्णेण अप्पाबहुअं पयडीहिं हिदीहिं अणुभागेहिं पदेसेहिं। ५०७. पयडीहिं उक्कस्सेण जाओ पयडीओ उदीरिज्जंति, उदिण्णाओ च ताओ थोवाओ । ५०८. जाओ बझंति ताओ संखेज्जगुणाओ'। ५०९. जाओ संकामिज्जति किससे कम होता है ? वेदक अधिकारकी इस चौथी गाथाका अर्थ कहते हैं-बन्ध, सत्कर्म, उदय, उदीरणा और संक्रम, इन पॉचो पदोका प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशकी अपेक्षा उत्कृष्टका उत्कृष्टके साथ और जघन्यका जघन्यके साथ अल्पवहुत्व कहना चाहिए ॥५०६॥ विशेषार्थ-गाथासे संक्रम आदि पॉचो पदोका उक्त अर्थ किस प्रकार निकलता है, इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-'जो जं संकामेदि' गाथाके इस प्रथम पदसे 'संक्रम'का ग्रहण किया गया है। 'जं बंधदि' इस द्वितीय पदसे 'बन्ध'का तथा 'सत्कर्म या सत्ता'का अर्थ ग्रहण किया गया है, क्योंकि, बन्धकी ही द्वितीयादि समयोमें 'सत्ता' संज्ञा हो जाती है । 'जं च जो उदीरेदि' इस तृतीय पदसे उदय और उदीरणा'का ग्रहण किया गया है। 'तं केण होइ अहियं' अर्थात् ये संक्रम, बन्ध आदि किससे अधिक होते हैं और किससे कम होते है, इस चौथे पदसे अल्पबहुत्वका अर्थ-बोध होता है । 'विदि-अणुभागे पदेसग्गे' इस अन्तिम चरणसे प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशका ग्रहण किया गया है। 'प्रकृति' पद यद्यपि गाथा-सूत्रमें नहीं कहा गया है, तथापि स्थिति, अनुभाग और प्रदेश प्रकृतिके अविनाभावी हैं, अतः प्रकृतिका ग्रहण अनुक्त-सिद्ध है। यहाँ यह आशंका की जा सकती है कि वेदक अधिकारमे उदय-उदीरणाका वर्णन तो संगत है, पर बन्ध, संक्रम और सत्कर्मका वर्णन असंगत है ? इसका समाधान यह है कि उदय और उदीरणा-सम्बन्धी विशेप निर्णय करनेके लिए बन्ध, संक्रम और सत्कर्मके वर्णनकी भी आवश्यकता होती है और उनके साथ अल्पबहुत्व लगाये विना उदय-उदीरणासम्बन्धी अल्पबहुत्वका समीचीन बोध हो नहीं सकता है । अतः यहॉपर उनका वर्णन असंगत नहीं है। यह गाथा इस अधिकारकी चूलिकारूप जानना चाहिए। ____ अब चूर्णिकार इनका यथाक्रमसे वर्णन करते हुए पहले प्रकृतियोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट अल्पबहुत्वका वर्णन करते हैं चर्णिस०-प्रकृतियोकी अपेक्षा उत्कृष्टतः अर्थात् अधिक से अधिक जितनी प्रकृतियाँ उदयमें आती हैं और उदीरणा की जाती हैं, वे आगे कहे जानेवाले पदोकी अपेक्षा सबसे कम हैं। क्योंकि, मोहकी दश प्रकृतियोका ही एक साथ उदय या उदीरणा होती है। जितनी प्रकृतियाँ बंधती हैं, वे उदय और उदीरणाकी प्रकृतियोसे संख्यातगुणी हैं। क्योकि, मोहकी बन्ध-योग्य प्रकृतियाँ छब्बीस बतलाई गई हैं, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृतिका वन्ध १ कुदो; एदासिं थोवभावणिष्णयो चे दससखावच्छिण्णपमाणत्तादो। जयध० २ कुदो, छन्वीससखावच्छिण्णपमाणत्तादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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