SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 640
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ कसाय पाहुड सुत्त [ ६ वेदक- अर्थाधिकार ५०२. 'सांतर णिरंतरं वा कदि वा समया दु बोद्धव्वा' त्ति एत्थ अंतरं च कालो च दो विहासिया' । ५३२ विदियगाहाए अत्थपरूवणा समत्ता । ५०३. 'बहुगदरं बहुगदरं से काले को णु थोवदरगं वा' त्ति एत्तो भुजगारो कायव्वो । ५०४. पयडिभुजगारो ट्ठिदिभुजगारो अणुभागभुजगारो पदेस भुजगारो । ५०५. एवं मग्गणाए कदाए समत्ता गाहा । 'जो जं संकामेदि य जं बंधदि जं च जो उदीरेदि । तं होइ केण अहियं द्विदि- अणुभागे पदेसग्गे ॥" ५०६. एदिस्से गाहाए अत्थो - बंधो संतकम्मं उदयो उदीरणा संकमो एदेसिं चूर्णिसू० - 'सांतर णिरंतरं वा कदि वा समया दु बोधव्वा' दूसरी गाथाके इस उत्तरार्धमे आये अंतर और काल (तथा उनके अविनाभावी शेष अनुयोगद्वार ) अधस्तन अर्थात् पहले प्रकृति- उदीरणा आदिके व्याख्यानावसरमें ही यथास्थान कह दिये गये हैं ||५०२ ॥ इस प्रकार दूसरी गाथाकी अर्थ- प्ररूपणा समाप्त हो जाती है । अब वेदक अधिकारकी तीसरी गाथाके व्याख्यानके लिए चूर्णिकार उत्तर सूत्र कहते हैंचूर्णिसू० - 'बहुगदरं बहुगदरं से काले को णु थोवदरगं वा' इस तीसरी गाथाके द्वारा भुजाकार - उदीरणाका व्याख्यान करना चाहिए । वह भुजाकार चार प्रकारका है - प्रकृति - भुजाकार, स्थिति-भुजाकार, अनुभाग-भुजाकार और प्रदेश - भुजाकार ||५०३-५०४॥ विशेषार्थ- इस गाथा द्वारा केवल भुजाकार - उदीरणाकी ही प्ररूपणा करनेकी सूचना नहीं की गई है । अपि तु पदनिक्षेप और वृद्धिकी भी प्ररूपणा करना चाहिए, यह भी सूचित किया गया है, क्योकि भुजाकार के विशेष वर्णनको पदनिक्षेप कहते है और पदनिक्षेपके विशेष वर्णनको वृद्धि कहते हैं । इसलिए इन दोनोका भुजाकार - उदीरणामे ही अन्तर्भाव हो जाता है। यह सब व्याख्यान यथावसर दूसरी गाथाकी व्याख्यामे कर ही आए हैं, अतः फिर उनका प्ररूपण नहीं करते हैं । चूर्णिस्०(० - इस प्रकार भुजाकारादि तीनो अनुयोगद्वारोके अनुमार्गण करनेपर तीसरी गाथाका अर्थ समाप्त हो जाता है ||५०५ ॥ चूर्णिसू० - 'जो जीव स्थिति, अनुभाग और प्रदेशाप्रमे जिसे संक्रमण करता है जिसे बाँधता है और जिसकी उदीरणा करता है, वह द्रव्य किससे अधिक होता है और १ 'सांतर णिरतरो वा' त्ति एदेण गाहासुत्तावययेण सूचिदकालतराण हेट्टिमोवरिम से साणिओगद्दारावणाभाव पड-टिट्ठदि-अणुभाग-पदेसुदीरणासु सवित्थरमणुमग्गियत्तादो | जयघ २ 'बहुगदरं बहुगदरं' इच्चदेण सुत्तावयवेण भुजगारसष्णिदो अवस्थाविसेसो सूचिदो । से काले 'कोणु थोवदरगंवा' त्ति एदेण वि अप्पदरसण्णिदो अवस्थाविसेसो सूचिदो । दोण्हमेदेसिं देसामासयभावेणाचट्टिदावत्तत्वसष्णिदाणमवत्यंतराणमेत्येव सगहो । दट्ठव्वो । पुणो 'अणुसमयमुदीरंतो' इच्चेण गाहापच्छ देण भुजगारविसयाण समुक्कित्तणादिअणियोगद्दाराण देतामासयभावेण कालाणियोगो परुविदो | जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy