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________________ 7. P DR. - ग The प्रस्तावना ४१ जंमि समते पुरिसवेतो सव्यसंकमेण कोहसंजलणाए संकेतो भवति तंमि समते कोहसंजलणाते उक्कोसपदेससंतं भवति । तस्सेव जूमि समते कोहसंजलणा माणसंजलणाए सव्वसंकमेण संकंता तमि समते माणसजलेगा उक्कीसं पदेससंतं भवति । तस्सेव जंमि समए माणसजलणी 'मायसिजलगाए सव्वस कमेण संकेता भवति तंमि समते मायासंजलणाए उकोसं पदेससंत । तस्सव जैम्मि समते मायासंजलणा लोभसंजलणाए सव्यसंकमेण संकंता भवति तंमि समते लोभसंजलणाए से उक्कोसं पदेससंतं । (कम्मप० सत्ता० पृ० ५६ ) चूकि कम्मपयडीकी चूर्णि उसकी गाथाओकी व्याख्यात्मक है, अतः उसमे 'जम्मि समते,' सव्वसकमेण आदि पदोंका प्रयोग विषयके स्पष्टीकरणार्थ किया गया है, पर वस्तुतः दोनोंमें निरूपित तत्त्व एक ही है और दोनोंकी रचना शैली भी एक है। (६) कसायपाहुडचूर्णिमें सम्यग्मिथ्यात्वके जघन्य प्रदेशसत्कर्मका स्वामित्व इस प्रकार बतलाया गया है प. १८६, सू० ३१. सम्मामिच्छत्तस्स जहएणयं पदेससंतकम्मं कस्स ? ३२. तथा चेव सुहुमणिगोदेसु कम्मट्ठिदिमच्छिदूण तदो तसेसु संजमासंजमं संजमं सम्मत्तं च बहुसो लभ्रूण चत्तारि वारे कसाए उवसामेदूण वे छावद्विसागरोवमाणि सम्मत्तमणुपालैदूण मिच्छत्तं गदो दीहाए उव्वेल्लणद्धाए उव्वेलिद तस्स जाधे सव्वं उव्वेलिदं, उदयावलिया गलिदा, जाधे दुसमयकालडिदियं एक्कम्मि द्विदिविसेसे सेसं, ताधे सम्मामिच्छत्तस्स जहएणं पदेससंतकम्मं । xxxएवं चेव सम्मत्तस्स वि । अब उक्त चूर्णिसूत्रका मिलान कम्मपयडीकी चूर्णिसे कीजिए xxxसम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं वे छावट्ठीतो सागरोवमाणं सम्मत्तं अणुपालेत्तु पच्छा मिच्छत्तं गतो चिरउव्वलणाए अप्पप्पणो उव्वलणाते प्रावलिगाते उवरिमं द्वितिखंडगं संकममाणं संकेतं, उदयावलिया खिज्जति जाव एगट्ठितिसेसे दुसमयकालद्वितिगे जहन्नं पदेससंतं । पाठक देखेंगे कि दोनों चूर्णियोंमें कितना अधिक साम्य है। भेद केवल इतना ही है कि कसायपाहुडचूर्णिमें सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य प्रदेशसत्कर्म-स्वामित्व वता करके पीछेसे तद्नुसार ही सम्यक्त्वप्रकृतिके स्वामित्वका वर्णन जाननेको कहा गया है, जबकि कम्मपयडीचूर्णिमे दोनों प्रकृतियों के स्वामित्वका निरूपण एक साथ किया गया है और इसका कारण यह है कि उसकी मूलगाथामें भी दोनोंका स्वामित्व एक साथ प्रतिपादन किया गया है। (७) आठ मध्यमकषायोंके जघन्य प्रदेशसत्कर्म-स्वामित्वको बतलाते हुए कसायपाहुडचूर्णिमें कहा गया है पृ० १६०, ३६ अभवसिद्धियपाओग्गजहएणयं काऊण तसेसु आगदो संजमासंजमं संजम सम्मत्तं च बहुसो लभ्रूण चतारि वारे कमाए उत्सामिदूण एइंदियं
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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