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________________ ५०८ कसाय पाहुड सुत्त [६ वेदक-अर्थाधिकार २९३. एगजीवेण कालो । २९४. मिच्छत्तस्स उक्कस्साणुभागउदीरगो केवचिरं कालादो होइ ? २९५. जहण्णेण एयसमओ। २९६. उक्कस्सेण वे समया' । २९७. अणुक्कस्साणुभागुदीरगो केवचिरं कालादो होदि ? २९८. जहण्णेण एगसमओ। २९९. उक्कस्सेण असंखेज्जा पोग्गलपरियट्टा । विशेषार्थ-तीनो वेदोंमेंसे विवक्षित वेदके उदयसे आपकश्रेणी पर चढ़कर नवें गुणस्थानके सवेद भागके एक समय अधिक आवलीके अन्तिम समयमें वर्तमान जीवके उस उस विवक्षित वेदकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा होती है। चूर्णिसू०-अब एक जीवकी अपेक्षा अनुभाग-उदीरणाके कालका वर्णन करते हैं।।२९३॥ शंका-मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागकी उदीरणाका कितना काल है ? ॥२९४॥ समाधान-जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल दो समय है । (क्योकि, इससे अधिक उत्कृष्ट संक्लेश संभव नहीं।) ॥२९५-२९६॥ शंका-मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट अनुभागकी उदीरणाका कितना काल है ? ॥२९७।। समाधान-जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन है ॥२९८-२९९॥ विशेषार्थ-उत्कृष्ट स्थितिवन्धके कारणभूत एक उत्कृष्ट कपायाध्यवसायस्थानके असंख्यात लोकप्रमाण अनुभागबन्धके योग्य अध्यवसायस्थान होते हैं। जो जीव उत्कृष्ट अनुभागवन्धके योग्य उत्कृष्ट संक्लेशसे परिणत होकर और उत्कृष्ट अनुभागकी उदीरणा करके परिणामोके वशसे तदनन्तर ही एक समय अनुत्कृष्ट अनुभागकी उदीरणा करके फिर भी तदनन्तर समयमें उत्कृष्ट संक्लेशको प्राप्त होकर उत्कृष्ट अनुभागकी उदीरणा करनेवाला हुआ। इस प्रकार मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट अनुभागकी उदीरणाका जघन्यकाल एक समयमात्र सिद्ध हो गया। यहाँ यह शंका नही करना चाहिए कि उत्कृष्ट संक्लेशसे गिरे हुए जीवके अन्तर्मुहूर्तके विना केवल एक समयमें ही पुनः उत्कृष्ट संक्लेशका होना कैसे सम्भव है ? इसका कारण यह है कि अनुभागवन्धाध्यवसायस्थानोमे इस प्रकारका कोई नियम नहीं माना गया १ त जहा-अणुक्कस्साणुभागुदीरगो सण्णिमिच्छाइट्ठी एगसमय उक्कस्ससकिलेसेण परिणमिय उक्करमाणुभागउदीरगो जादो । विदियसमए उक्कस्सस किलेसक्खएणाणुक्कस्सभावमुवगओ। लदो तस्स मिच्छत्तुक्कस्साणुभागोदीरणकालो एगसमयमेत्तो । जयध० २ त कथ ? अणुक्कस्साणुमागुदीरगो उक्कस्ससतकम्मिओ उकस्ससकिलेसमावृरिय दोसु समएसु मिच्छत्तत्स उक्करमाणुभागुदीरगो जादो। तदो से काले सकिलेसपरिक्खएणाणुकसभावे णिवदिदो। लदो मिच्छत्तुक्कस्साणुभागुदीरगस्स उक्कस्सकालो विसमयमेत्तो, तत्तो परमुक्कस्ससकिलेसस्सावट्टाणाभावादो । जयध० ३ कथमुक्कस्ससकिलेसादो पडिमग्गस्स अंतोमुहुत्तेण विणा एगसमयेणेव पुणो उकससकिलेसावरणसभवो त्ति णेहासकणिज; अणुभागवधज्झवसाणट्ठाणेसु तहाविहणियमाणभुवगमादो । जयध० ४ कुदो; पचिंदिए हिंतो एइदिएसु पइट्ठस्स उकस्ससकिलेसपडिलभेण विणा आवलियाए असंखेन. दिभागमेत्तपोग्गलपरियहेतु परिभमणदसणादो । जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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