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________________ ५०९ गा० ६२ ] अनुभाग-उदीरणा-काल-निरूपण ३००. सम्मत्तस्स उकस्साणुभागुदीरगो केवचिरं कालादो होदि १ ३०१. जहण्णुक स्सेण एगसमओ। ३०२. अणुक्कस्साणुभाग-उदीरगो. केवचिरं कालादो होदि ? ३०३. जहण्णेण अंतोमुहुर्त । ३०४. उक्कस्सेण छावद्विसागरोवमाणि आवलियूणाणि । ३०५. सम्मामिच्छत्तस्स उकस्साणुभागउदीरगो केवचिरं कालादो होदि ? ३०६. जहण्णुक्कस्सेण एयसमयों । है । मिथ्यात्वकी अनुत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणाका उत्कृष्टकाल आवलीके असंख्यातवें भागमात्र पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण माना गया है । क्योकि, पंचेन्द्रियोसे आकर एकेन्द्रियोमे उत्पन्न हुए जीवोंके उत्कृष्ट संक्लेशके प्राप्त हुए विना असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनकाल तक परिभ्रमण देखा जाता है। शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिकी उत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणाका कितना काल है ? ॥३०॥ समाधान-जघन्य और उत्कृष्टकाल एक समयमात्र है ॥३०१॥ विशेषार्थ-क्योकि, मिथ्यात्वके अभिमुख, सर्वाधिक संक्लिष्ट असंयतसम्यग्दृष्टिके अन्तिम समयको छोड़कर अन्यत्र सम्यक्त्व-प्रकृतिकी उत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणाका होना सम्भव नहीं है। शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिकी अनुत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणाका कितना काल है ॥३०२॥ समाधान-जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्टकाल आवली कम छयासठ सागरोपम है ॥३०३-३०४॥ विशेषार्थ-वेदकसम्यक्त्वको ग्रहण कर सर्वजघन्य अन्तर्मुहूर्तके पश्चात् ही मिथ्यात्वको प्राप्त होनेपर सम्यक्त्वप्रकृतिकी अनुत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणाका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण ही पाया जाता है । सम्यक्त्वप्रकृतिकी अनुत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणाका उत्कृष्टकाल एक आवली कम छयासठ सागरोपम है। इसका कारण यह है कि वेदकसम्यक्त्वका उत्कृष्ट काल ही इतना माना गया है । एक आवली कम कहनेका अभिप्राय यह है कि वेदकसम्यक्त्वके छयासठ सागरोपमकालके पूरा होनेमे अन्तमुहूर्त शेप रह जानेपर दर्शनमोहनीयको क्षपण करनेवाले जीवके सम्यक्त्वकी प्रथम स्थितिके समयाधिक आवलीप्रमाण शेष रह जानेपर सम्यक्त्वप्रकृतिकी उदीरणाका अवसान होता है। शंका-सम्यग्मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणाका कितना काल है १ ॥३०५।। समाधान-जघन्य और उत्कृष्टकाल एक समय है ।।३०६।। १ कुदो; मिच्छत्ताहिमुहसव्वसकिलिट्ठासजदसम्मादिठ्ठिचरिमसमय मोत्तूणण्णत्थ सम्मत्तुक्कस्साणुभागुदीरणाए सभवाणुवलभादो । जयध० २ कुदो, वेदगसम्मत्त घेत्तूण सव्वजहण्णतोमुत्तेण कालेण मिच्छत्त पडिवण्णम्मि अणुकस्सजहण्णकालस्स तप्पमाणत्तोवलभादो । जयध० ३ कुदो, वेदगसम्मत्तउक्कस्सकालस्सावलियूणस्स पयदुक्कस्सकालत्तणावलबियत्तादो। कुदो आवलि- - यूणत्तमिदि चे छावट्ठिसागरोवमाणमवसाणे अंतोमुहुत्तसेसे दसणमोहणीयं खर्वतस्स सम्मत्तपढमछिदीए समयाहियावलियमेत्तसेसाए सम्मत्तु दीरणाए पजवसाण होइ, तेणावलियूणत्तमेत्थ दट्ठव्वमिदि । जयध० ४ किं कारण, सव्वुक्कस्ससकिलेसेण मिच्छत्त पडिवजमाणसम्मामिच्छाइट्ठिचरिमसमए चेव सम्मामिच्छत्त कस्साणुभागुदीरणदसणादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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