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________________ ५०६ कसाय पाहुड सुत्त [६ वेदक-अर्थाधिकार २६९. सम्मामिच्छत्तस्स जहण्णाणुभागुदीरणा कस्स १ २७०. सम्मत्ताहिमुहचरिमसमयसम्मामिच्छाइडिस्स सव्वविसुद्धस्स । २७१. अणंताणुवंधीणं जहण्णाणुभागउदीरणा कस्स १२७२. संजमाहिमुह चरिमसमयमिच्छाइहिस्स सव्वविसुद्धस्स । २७३. अपचक्खाणकसायस्स जहण्णाणुभागउदीरणा कस्स १ २७४. संजमाहिमुहचरिमसमय-असंजदसम्माइहिस्स सव्वविसुद्धस्स । २७५. पञ्चक्खाणकसायस्स जहण्णाणुभागउदीरणा कस्स ? २७६. संजमाहिमुहचरिमसमय-संजदासंजदस्स सव्वविसुद्धस्स । २७७. कोहसंजलणस्स जहण्णाणुभागउदीरणा कस्स ? २७८. खवगस्स चरिमसमयकोधवेदगस्स' । २७९. शंका-सम्यग्मिथ्यात्वकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा किसके होती है ? ॥२६९॥ समाधान-सम्यक्त्वको ग्रहण करनेके अभिमुख, सर्व-विशुद्ध चरम समयवर्ती सम्यग्मिथ्यादृष्टिके होती है ।।२७०॥ विशेषार्थ-यहां 'संयमके अभिमुख' ऐसा न कहनेका कारण यह है कि कोई भी जीव तीसरे गुणस्थानसे सम्यक्त्व और संयमको एक साथ ग्रहण नहीं कर सकता है । शंका-अनन्तानुवन्धी कपायोकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा किसके होती है ? ॥२७॥ समाधान-संयमके अभिमुख, सर्व-विशुद्ध चरम समयवर्ती मिथ्याष्टिके होती है ॥२७२॥ शंका-अप्रत्याख्यानावरण कषायकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा किसके होती है ? ॥२७३॥ समाधान-संयमके अभिमुख, सर्व-विशुद्ध चरमसमयवर्ती असंयतसम्यग्दृष्टिके होती है ॥२७४॥ शंका-प्रत्याख्यानावरण कषायकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा किसके होती है ? ॥२७५॥ समाधान-संयमके अभिमुख, सर्व-विशुद्ध, चरमसमयवर्ती संयतासंयत्तके होती है ॥२७६॥ शंका-संज्वलन क्रोधकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा किसके होती है ? ॥२७७॥ समाधान-चरमसमयवर्ती क्रोधका वेदन करनेवाले अनिवृत्तिसंयत क्षपकके होती है ? ||२७८॥ समओवट्टणाए सुठु ओहणि ट्ठिदसम्मत्ताणुभागविसयउदोरणाए तत्थ जहण्णभावसिद्धीए णिव्याहमुवलंभादो । एसा समयाहियावलियअक्खीणदसणमोहणीयस्स जहण्णाणुभागुदीरणा एयट्ठाणिया । एत्तो पुचिल्लासेसअणुभागुदीरणाओ एयटटाणिय-विट्ठाणियसलवाओ जहाकममणंतगुणाओ । तदो तप्परिहारेणे. स्थेव जहण्णसामित्त गहिदं । जयध० १ जो खवगो कोधोदएण खवगढिमारुढो, अट्ठकसाए खविय पुणो जहाकममंतरकरणं समाणिय णवंसय-इत्यिवेद-छप्णोकसाए पुरिसवेदं च जहावुत्तण क्मेण णिण्णासिय तदो अस्सकष्णकरण-किट्टीकरणद्धाओ गमिय कोहतिण्णिसंगहकिटीओ वेदेमाणो तदियसगहकिट्टीवेदयपढमट्ठिटीए समयाहियावलियमेत्तसेसाए चरिमसमयकोहवेदगो जादो, तत्स कोहसनलणविसया जहण्णाणुभागुटीरणा होदि, हेछिमासेस उदीरणाहितो एदित्से उदीरणाए अणंतगुणहीणत्तदंसणादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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