SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 613
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गा० ६२] अनुभाग-उदीरणा-स्वामित्व-निरूपण ५०५ २६१. सत्तमाए पुडवीए णेरइयस्स सव्वसंकिलिट्ठस्स । २६२. हस्स-रदीणमुक्कस्साणुभागउदीरणा कस्स ? २६३. सदार-सहस्सारदेवस्स सव्वसंकिलिट्ठस्स। २६४. एत्तो जहणिया उदीरणा । २६५. मिच्छत्तस्स जहण्णाणुभागुदीरणा कस्स ? २६६ संजयाहिमुहचरिमसमयमिच्छाइट्ठिस्स सव्वविसुद्धस्स । २६७. सम्मत्तस्स जहण्णाणुभागुदीरणा कस्स ? २६८. समयाहियावलिय-अक्खीणदंसणमोहणीयस्स । समाधान-सातवी पृथिवीके सर्वोत्कृष्ट संक्लेशको प्राप्त नारकीके होती है ॥२६१॥ विशेषार्थ-ये नपुंसकवेदादि सूत्रोक्त प्रकृतियाँ अत्यन्त अप्रशस्त-स्वरूप होनेसे नितरां महादुःखोत्पादन-स्वभाववाली है। फिर त्रिभुवनमे सातवे नरकसे अधिक दुःख भी और कहीं नहीं । और नपुंसकवेद, अरति, शोकादिकी उदीरणाके निमित्तकारणरूप अशुभतम बाह्य द्रव्य सप्तम नरकसे बढ़कर अन्यत्र सम्भव नहीं हैं, इन्ही सब कारणोसे उक्त प्रकृतियोकी उत्कृष्ट अनुभागउदीरणा सप्तम नरकके सर्वसंक्लिष्ट नारकीके बतलाई गई है। शंका-हास्य और रतिप्रकृतिकी उत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणा किसके होती है ?॥१६२॥ समाधान-सर्वाधिक संक्लिष्ट, शतार-सहस्रार-कल्पवासी देवोके होती है ॥२६३॥ विशेषार्थ-क्योकि, उक्त राग बहुल देवोमे हास्य और रतिके कारण प्रचुरतासे पाये जाते है । उक्त देवोके हास्य-रतिका छह मास तक निरन्तर एक-सा उदय बना रहता है, अर्थात् वहॉके देव छह मास तक लगातार हँसते हुए रह सकते हैं । चूर्णिसू०-अब इससे आगे जघन्य अनुभाग-उदीरणाके स्वामित्वका वर्णन करते हैं ॥२६४॥ शंका-मिथ्यात्वकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा किसके होती है ? ॥२६५॥ समाधान-(सम्यक्त्व और ) संयमको ग्रहण करनेके अभिमुख, सर्वविशुद्ध चरमसमयवर्ती मिथ्याष्टिके होती है ॥२६६॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा किसके होती है ? ॥२६७॥ समाधान-एक समय अधिक आवलीकालवाले अक्षीणदर्शनमोह सम्यग्दृष्टिके होती है, अर्थात् जिसने दर्शनमोहका क्षपण प्रारम्भ कर दिया है, पर अभी जिसके क्षयमे एक समय-अधिक एक आवलीप्रमाण काल बाकी है, ऐसे वेदकसम्यक्त्वीक सम्यक्त्वप्रकृतिकी जघन्य अनुभाग-उदीरणा होती है ॥२६८॥ १ एदाओ पयडीओ अञ्चतअप्पसत्यसरूवाओ, एयतेण दुक्खुप्पायणसहावत्तादो। तदो एदासिमुदीरणाए सत्तमपुढवीए चेव उक्कस्ससामित्त होइः तत्तो अण्णदरस्स दुक्खणिहाणस तिहुवणभवणभतरे कहिं पि अणुवलभादो, तदुदीरणाकारणबज्झदव्वाण पि असुहयराण तत्थेव बहुलं सभवोवलभादो । जयध० २ कुदो, सदार-सहस्सारदेवेसु रागबहुलेसु हस्स-रदिकारणाण बहूणमुवलभादो । णेदमसिद्धः उक्कत्सेण छम्मासमेत्तकाल तत्थ हस्स-रदीणमुदयो होदि त्ति परमावगमोवएसवलेण सिद्धत्तादो । जयध० ३ किं कारण, विसोहिपयरिसेण अप्पसत्थाण कम्माणमणुभागो सुट्ठु ओहट्टिऊण हेठिमाण तिमभागसरूवेणुदीरिजदि त्ति । तदो सम्मत्त सजम च जुगव गेण्हमाणचरिमसमयमिच्छाइहिस्स जहण्णसामित्तमेद दट्ठव्व । जयध० ४ कुदो, दसणमोहक्खवयतिव्वपरिणामेहि बहुअ खडयघाद पाविदूण पुणो अतोमुहुत्तमेत्तकालमणु
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy