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________________ - काय पाहुड सुत्त [६ घेदफ-अर्थाधिकार दीरणा कस्स ? २५५. मिच्छत्ताहिमुहचरिमसमयअसंजदसम्मादिहिस्स सव्वसंकिलिदुस्स' । २५६. सम्मामिच्छत्तस्स उकस्साणुभागुदीरणा करत ? २५७. मिच्छत्ताहिमुहचरिमसमय-सम्मामिच्छाइद्विस्स सव्वसंकिलिहस्स । २५८.इत्थिवेद-पुरिसवेदाणमुक्कस्साणुभागुदीरणा कस्स ? २५९.पंचिंदियतिरिक्खस्स अट्ठवासजादस्स करहस्स' सव्वसंकिलिट्ठस्स । २६०. णवूसयवेद-अरदि-सोग-भय-दुगुंछाणमुक्कस्साणुभागुदीरणा कस्स ? समाधान-सर्वोत्कृष्ट संक्लेशको प्राप्त और मिथ्यात्वके अभिमुख चरमसमयवर्ती असंयतसम्यग्दृष्टिके होती है ॥२५५॥ शंका-सम्यग्मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणा किसके होती है ? ॥२५६॥ समाधान-सर्वाधिक संक्लेश-युक्त एवं मिथ्यात्वको प्राप्त होनेके सम्मुख चरमसमयवर्ती सम्यग्मिथ्यादृष्टिके होती है ॥२५७॥ शंका-स्त्रीवेद और पुरुपवेदकी उत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणा किसके होती है ? ॥२५८॥ समाधान-अष्टवर्षायुष्क, सर्वाधिक संक्लिष्ट, पंचेन्द्रिय तिर्यच करभ अर्थात् ऊँट और ऊँटनीके होती है ॥२५९॥ विशेपार्थ-कर्मोदयकी विचित्रतापर आश्चर्य है कि हजारो शरीर बनाकर एक साथ स्त्रीसेवन करनेवाले चक्रवर्ती या इन्द्रके पुरुषवेदकी उत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणा नहीं होती। और इसी प्रकार हजारो रूप बनाकर एक साथ इन्द्रके साथ वैषयिक सुख भोगनेवाली इन्द्राणीके भी स्त्रीवेदकी उत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणा नहीं होती, जव कि आठ वर्ष या इससे अधिक आयुके धारक और वेदोदयसे उत्कृष्ट वैकल्य या संक्लेशको प्राप्त ऊँटके पुरुपवेदकी और ऊँटनीके स्त्रीवेदकी उत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणा होती है। इसका एकमात्र कारण जातिगत स्वभाव ही है। ऊँटऊँटनीके कामकी वेदना देव, मनुष्य और तिर्यच इन तीनोमे सबसे अधिक होती है, वह स्त्री या पुरुषवेदके तीव्र उदय होनेपर कामान्ध या उन्मत्त हो जाता है, जब तक उसके प्रकृतवेदकी उदीरणा नहीं हो जाती है, तब तक उसे और कुछ नही सूझता है । शंका-नपुंसकवेद, अरति, शोक, भय और जुगुप्साकी उत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणा किसके होती है ? ॥२६०॥ १ कुदो, जीवादिपयत्थे दूसिय मिच्छत्त गच्छमाणस्स तस्स उक्कस्ससकिलेसेण बहुआणुभागहाणीए अभावेण सम्मत्तुक्कस्सागुभागुदीरणाए तत्थ सम्वद्धमुवलभादो । जयध २ उष्ट्रो मयः शृङ्खलिकः करमः शीघ्रगामुकः ॥९१॥ धनजयः ३ एत्थ पंचिंदियतिरिक्खणिद्दे सो मणुस-देवगदिवुदासट्ठो; तत्थुक्कसवेदस किलेसाभावादो। कुदो एद णव्वदे ? एदम्हादो चेव सुत्तादो । अठ्वासजादस्सेत्ति तत्स विसेसणमछ्वस्सेहितो हेट्टा सबुक्कस्तो वेदसकिलेसो ण होदि त्ति जाणावणटुं | करभस्सेत्ति वयणं नादिविसेसेण तत्थेवित्थि पुरिसदाणमुय स्साणु. मागुदीरणा होदि त्ति पदुप्पायणछ । तत्स वि उकत्ससकिलेसेण परिणदावत्थाए चेव उमस्साणुभागउदीरणा होदि त्ति जाणावणट्ठ सव्वसंकिलिट्ठस्सेत्ति भणिद । तदो एवं विहस्स जीवत्स पयदुक्करससामित्तमिदि सिद्ध। जयघ
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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