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________________ गा० ६२] अनुभाग-उदीरणा-स्वामित्व-निरूपण २४९. एगजीवेण सामित्तं । २५०. तं जहा। २५१. मिच्छत्तस्स उक्कस्साणुभागुदीरणा कस्स १ २५२. मिच्छाइट्ठिस्स सण्णिस्स सव्वाहिं पज्जत्तीहिं पज्जत्तयदस्स उक्कस्ससंकिलिट्ठस्स' । २५३. एवं सोलसकसायाणं । २५४. सम्मत्तस्स उक्कस्साणुभागु विशेषार्थ-उक्त प्रकृतियोकी देशघाती अनुभाग-उदीरणा संयतासंयतादि उपरिम गुणस्थानोके समान असंयतसम्यग्दृष्टि से लेकर संज्ञी पंचेन्द्रिय मिथ्यादृष्टियोमे भी परिणामोकी विशुद्धिके समय पाई जाती है। इतना ही नहीं, असंज्ञी पंचेन्द्रिय और विकलेन्द्रियोमे भी यथायोग्य संभव विशुद्धिके कारण देशघाती अनुभाग-उदीरणाके पाये जानेका कही कोई निषेध नहीं है । और तो क्या, एकेन्द्रिय जीवो तकमे यथासम्भव विशुद्धिके कारण उक्त प्रकृतियोकी देशघाती अनुभागउदीरणा पाई जाती है । यहाँ प्रकृत सूत्रके द्वारा असंज्ञी पंचेन्द्रियादि एकेन्द्रिय जीवोमे सर्वघाती अनुभाग-उदीरणाका निषेध नहीं किया गया है किन्तु सर्वघातीके समान देशघातीके सद्भावका भी निरूपण किया गया है, ऐसा अभिप्राय लेना चाहिए । चूर्णिसू०-अव एक जीवकी अपेक्षा अनुभाग-उदीरणाका स्वामित्व कहते है। वह इस प्रकार है ॥२४९-२५०॥ शंका-मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणा किसके होती है ? ॥२५१।। समाधान-सर्व पर्याप्तियोसे पर्याप्त और उत्कृष्ट संक्लेशको प्राप्त, संजी पंचेन्द्रिय मिथ्याष्टिके होती है ॥२५२॥ चूर्णिसू०-इसी प्रकार अनन्तानुबन्धी आदि सोलह कषायोकी उत्कृष्ट अनुभागउदीरणाका स्वामित्व जानना चाहिए । अर्थात् उत्कृष्ट संक्लेशको प्राप्त, संजी, पर्याप्तक मिथ्यादृष्टि जीव ही सोलह कषायोकी उत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणाका स्वामी है ॥२५३॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिकी उत्कृष्ट अनुभाग-उदीरणा किसके होती है ? ॥२५४॥ उदीरणासम्भावमविप्पडिवत्तिसिद्ध कादूण देसघादि-उदीरणाए तत्थासभवणिरायरणमुहेण सभवविहाणमेदेण सुत्तेण कीरदे । तदो सणिमिच्छाइट्ठिप्पहुडि एइ दियपजवसाणसव्वजीवसमासेसु एदेसि कम्माणमणुभागुदीरणा देसघादी वा सव्वघादी वा होदूण लभदि त्ति णिच्छयो कायव्यो । जयध० १ किमट्ठमण्णजोगववच्छेदेण सव्वस किलिटरसेव पयदसामित्तणियमो ? ण, म दसकिलेसेण विसोहीए वा परिणदस्स सव्वुक्कस्साणुभागुदीरणाणुववत्तीदो । तदो उक्करसाणुभागसतकम्मट्ठाणचरिमफद्दयचरिमवग्गणाविभागपडिच्छेदे उक्कस्ससकिलेसवसेण थोवयरे चेव होदूण तप्पाओग्गहेट्ठिमाणतगुणहीणच उट्ठाणाणुभागसरूवेण उदीरेमाणस्स सण्णिपचिदियपजत्तमिच्छादिठिस्स उक्कस्सय मिच्छत्ताणुभागुदीरणासामित्त होदि त्ति एसो सुत्तस्थसमुच्चयो । एत्य उक्कस्साणुभागसतकम्मादो चेव उक्करसाणुभागुदीरणा होदि त्ति णत्थि णियमो, किंतु तप्पाओग्गाणुक्कस्साणुभागसतकम्मेण वि उकस्साणुभागुदीरणाए होदव्य, अण्णहा थावरकायादो आगतूण तसकाइएसुप्पण्णस्स सव्वकालमुक्कस्साणुभागसतकम्मुप्पत्तीए अभावप्पसगादो । जयध० २ एत्थ सव्वुक्कस्ससकिलिमिच्छाइट्ठि-अणुभागुदीरणाए सामित्तविसईकयाए माहप्पजाणावण?मेदमप्पाबहुअमणुगतव्व । त जहा-सम्मत्ताहिमुहचरिमसमयमिच्छाइठिस्स अणुभागुदीरणा थोवा, दुचरिमसमए अणतगुणभहिया, तिचरिमसमए अणतगुणन्महिया । एव चउत्थसमयादी णेदव्य जाव सव्वुक्कस्ससकिलिट्ठमिच्छाइट्ठिस्स अणुभागुदीरणा अणतगुणा त्ति । तदो अण्णजागववच्छेदेणेस्थेव मिच्छत्त-सोलसकसायाणमुकास्ससामित्तमवहारयन्नमिदि । जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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