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________________ ५०० कसाय पाहुड सुत्स . [६ घेदक-अर्थाधिकार एवमणंताणि फद्दयाणि ण ओकड्डिजंति' । २३०. केत्तियाणि ? जत्तिगो जहण्णगो णिक्खेवो जहणिया च अइच्छावणा तत्तिगाणि । २३१. आदीदो पहुडि एत्तियमेत्ताणि फयाणि अइच्छिदूण तं फद्दयमोकड्डिजदि। २३२. तेण परमपडिसिद्धं । २३३: एदेण अट्ठपदेण अणुभागुदीरणा दुविहा-मूलपयडि-अणुभागउदीरणा च उत्तरपयडि-अणुभागउदीरणा च । २३४ एत्थ मूलपयडिअणुभाग उदीरणा भाणियव्वा । २३५. उत्तरपयडिअणुभागुदीरणं वत्तइस्सामो । २३६. तत्थेमाणि चउवीसमणियोगद्दाराणि सण्णा सव्वउदीरणा एवं जाव अप्पाबहुए ति । भुजगार-पदणिक्खेव-वड्डि-हाणाणि च । २३७. तत्थ पुव्वं गमणिज्जा दुविहा-सष्णा घाइसण्णा ठाणसण्णा च । २३८. ताओ अनन्त स्पर्धक उदीरणाके लिए अपकर्पित नहीं किये जा सकते है । उदीरणाके लिए अयोग्य स्पर्धक कितने हैं ? जितना जघन्य निक्षेप है और जितनी जघन्य अतिस्थापना है, तत्प्रमाण अर्थात् उतने उदीरणाके अयोग्य स्पर्धक होते हैं ॥२२५-२३०॥ चूर्णिसू-विवक्षित कर्म-प्रकृतिके आदि स्पर्धकसे लेकर इतने अर्थात् जघन्य निक्षेप और जघन्य अतिस्थापना-प्रमाण स्पर्धकोको छोड़कर जो स्पर्धक प्राप्त होता है, वह स्पर्धक उदीरणाके लिए अपकर्पित किया जाता है। इससे परे कोई निषेध नहीं है, अर्थात् आगेके समस्त स्पर्धक उदीरणाके लिए अपकर्षित किये जा सकते हैं। इस अर्थपदके द्वारा वर्णनकी जानेवाली अनुभाग-उदीरणा दो प्रकारकी है-मूलप्रकृति-अनुभाग-उदीरणा और उत्तरप्रकृतिअनुभाग-उदीरणा । इनमेसे मूलप्रकृतिअनुभाग-उदीरणाका संज्ञा आदि तेईस अनुयोगद्वारोसे व्याख्यानाचार्योंको निरूपण करना चाहिए ॥२३१-२३४॥ चूर्णिसू०-अब उत्तरप्रकृति-अनुभाग-उदीरणाको कहेगे। उसके विपयमें ये चौवीस अनुयोगद्वार हैं-१ संज्ञा, २ सर्वउदारणा, ३ नोसर्वउदीरणा, ४ उत्कृष्टउदीरणा, ५ अनुत्कृष्टउदीरणा, ६ जघन्यउदीरणा, ७ अजधन्यउदीरणा, ८ सादिउदीरणा, ९ अनादिउदीरणा, १० ध्रुवउदीरणा, ११ अध्रुवउदीरणा, १२ एक जीवकी अपेक्षा स्वामित्व, १३ काल, १४ अन्तर, १५ नानाजीवोकी अपेक्षा भंगविचय, १६ भागाभाग, १७ परिमाण, १८ क्षेत्र, १९ स्पर्शन, २० काल, २१ अन्तर, २२ सन्निकर्ष, २३ भाव और २४ अल्पवहुत्व । तथा भुजाकार, पदनिक्षेप, वृद्धि और स्थान, इन सर्व अनुयोगद्वारोसे अनुभाग-उदीरणाका वर्णन करना चाहिए ॥२३५-२३६॥ चूर्णिस०-उत्तरप्रकृति-उदीरणाके वर्णन करनेवाले अनुयागद्वारों में प्रथम संज्ञा नामक अनुयोगद्वार जाननेके योग्य है । वह इस प्रकार है-संज्ञाके दो भेद हैं घातिसंज्ञा और स्थानसंज्ञा । इन दोनो ही संज्ञाओको एक साथ कहेंगे ॥२३७-२३८॥ १ केत्तिवाणि ? अतिगो जहण्णगो णिक्खेवो, जहणिया च अइच्छावणा; तत्तिगाणि । अणंताणि ण ओकडिजति । जयध २ तत्थ जा सा घादिसण्णा, सा दुविहा, सव्वधादि-देसघादिभेदेण । ठाणसण्णा चउन्विहा, लदासमाणादिसहावभेदेण भिण्णचादो। नयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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