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________________ गा० ६२] : . . उदीरणास्थान-काल-निरूपण ४९३ . १७४. वावीसाएं पणुवीसाए पयडीणं पवेसगो केवचिरं कालादो होदि ? १७५. जहण्णेण एयसमओ । १७६. उक्स्से ण अंतोमुहुत्तं । प्रकृतियोका प्रवेशक हुआ और अन्तर्मुहूर्तकालके भीतर ही क्षपकश्रेणीपर चढ़कर आठ कायोका क्षयकर तेरह प्रकृतियोका प्रवेशक बन गया । इस प्रकार अन्तर्मुहूर्तप्रमाण जघन्य काल उपलब्ध हो गया। अथवा कोई उपशमसम्यग्दृष्टि जीव अनन्तानुबन्धी कषायचतुष्टयकी विसंयोजना करके सर्वजघन्य अन्तर्मुहूर्तप्रमाण इक्कीस प्रकृतियोका प्रवेशक रहकर छह आवली कालके • अवशेप रहनेपर सासादनगुणस्थानको प्राप्त होकर बाईस प्रकृतियोका प्रवेशक बन गया । इस प्रकार भी अन्तर्मुहूर्तप्रमाण जघन्य काल सिद्ध हो जाता है। अब इक्कीस प्रकृतियोके प्रवेश करनेवाले जीवके उत्कृष्ट कालकी प्ररूपणा करते है-मोहकर्मकी चौबीस प्रकृतियोकी सत्तावाला कोई एक देव या नारकी पूर्व कोटीकी आयुवाले कर्मभूमिज मनुष्योंमें उत्पन्न हुआ। गर्भसे लेकर आठ वर्ष और अन्तर्मुहूर्तके पश्चात् दर्शनमोहनीयका क्षपणकर इक्कीस प्रकृतियोका प्रवेशक बना और अपनी शेष मनुष्यायुको पूरा करके मरकर तेतीस सागरोपमकी आयुवाले देवोंमें उत्पन्न हुआ। वहॉकी आयु पूरी करके च्युत होकर पुनः पूर्वकोटीकी आयुके धारक कर्मभूमियॉ मनुष्योमें उत्पन्न हुआ । जब जीवनका अन्तर्मुहूर्तकाल शेष रह गया, तब संयमको ग्रहणकर क्षपकश्रेणीपर चढ़कर और आठ कपायोका क्षयकर तेरह प्रकृतियोका प्रवेशक हुआ । इस प्रकार कुछ अन्तर्मुहूर्तोंसे अधिक आठ वर्षोंसे कम दो पूर्वकोटी सातिरेक तेतीस सागरोपम उत्कृष्ट काल इक्कीस प्रकृतियोके प्रवेशकका सिद्ध होता है । चूर्णिसू०-बाईस प्रकृतियो और पच्चीस प्रकृतियोके प्रवेश करनेवाले जीवका कितना काल है ? ॥१७४॥ समाधान-जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है ॥१७५-१७६॥ 'विशेषार्थ-इनमेंसे पहले बाईस प्रकृतियोके प्रवेश करनेवाले जीवके एक समयप्रमाण जघन्य कालकी प्ररूपणा करते हैं-अनन्तानुबन्धी कपायकी विसंयोजना करके बना हुआ उपशमसम्यग्दृष्टि जीव अपना काल पूरा करके सासादन, मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व या सम्यक्त्वप्रकृतिको प्राप्त होनेपर प्रथम समयमे वह वाईस प्रकृतियोंका प्रवेश करता है और तदनन्तर समयमें ही यथाक्रमसे पच्चीस, अट्ठाईस, या चौबीस प्रकृतियोका प्रवेश करनेवाला हो जाता है, इस प्रकार एक समयप्रमाण जघन्य काल सिद्ध हो जाता है । अब पच्चीस प्रकृतियोके प्रवेश करनेवाले जीवके जघन्य कालकी प्ररूपणा करते हैं-अनन्तानुवन्धीकी विसंयोजना करनेवाले उपशमसम्यग्दृष्टि जीवके उपशम सम्यक्त्व-कालके द्विचरम समयमें सासादन गुणस्थानको प्राप्त होनेके प्रथम समयमे किसी एक अनन्तानुवन्धीके उदय आनेसे पाईस प्रकृतिरूप प्रवेश स्थान उपलब्ध हुआ और दूसरे समयमें ही उदयावलीके वाहिर अवस्थित शेष तीन अनन्तानुबन्धी प्रकृतियोके उदयावलीमें प्रवेश करनेपर पच्चीस प्रकृतियोका प्रवेश उपलब्ध हुआ । इसके दूसरे समयमे ही मिथ्यात्वको प्राप्त हो जानेसे छब्बीस प्रकृतिरूप प्रवेश
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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