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________________ ४९२, कसाय पाहुड सुत्त : [६ वेदक-अर्थाधिकार - १६४. एयजीवेण कालो । १६५. एकिस्से दोहं छण्हं णवण्हं बारसण्हं तेरसण्हं एगूणवीसण्हं वीसण्हं पयडीणं पवेसगो केवचिरं कालादो होइ ? १६६. जहण्णेण एयसमओ । १६७. उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं । १६८. चदुण्हं सत्तण्हं दसहं पयडीणं पवेसगो केवचिरं कालादो होइ ? १६९. जहण्णुकस्सेण एयसमओ । १७०. पंच अट्ट एक्कारस चोदसादि जाव अट्ठारसा त्ति एदाणि सुण्णट्ठाणाणि । १७१. एकवीसाए पयडीणं पवेसगो केवचिरं कालादो होदि १ १७२. जहण्णेण अंतोमुहुत्तं । १७३. उक्कस्सेण तेत्तीसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि । संयतोमें भी अमुक स्थान उपशामक संयतोके योग्य हैं और अमुक स्थान क्षपक संयतोके योग्य हैं । असंयतोंमे अमुक स्थान सम्यग्दृष्टिके योग्य हैं और अमुक स्थान मिथ्यादृष्टि आदिके योग्य है, इत्यादिका निर्णय समुत्कीर्तनाके आधारपर सुगमतासे हो जाता है, अतः चूर्णिकारने स्वामित्वका वर्णन पृथक् नहीं किया है। चूर्णि सू०-अब एक जीवकी अपेक्षा उपर्युक्त प्रवेश-स्थानोके कालका वर्णन करते हैं ॥१६४॥ शंका-एक, दो, तीन, छह, नौ, बारह, तेरह, उन्नीस और बीस प्रकृतियोके उदीरकका कितना काल है ? ॥१६५॥ समाधान-उक्त स्थानो के उदीरकका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है ।।१६६-१६७॥ _ विशेपार्थ-मरण आदिकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय और स्वस्थानकी अपेक्षा अन्तर्मुहूर्तप्रमाण उत्कृष्ट काल आगमाविरोधसे जानना चाहिए। शंका-चार, सात और दश प्रकृतियोके उदीरकका कितना काल है ? ॥१६८॥ समाधान-उक्त प्रवेशस्थानोका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समयमात्र है । क्योंकि उक्त प्रकृतियोके उदयावलीमें प्रवेश करनेके एक समय पश्चात् ही क्रमशः छह, नौ और बारह प्रकृतियाँ उद्यावलीमे प्रवेश कर जाती हैं ॥१६९॥ चूर्णिसू०-पॉच, आठ, ग्यारह, और चौदहसे लेकर अठारह तकके स्थान, ये सब शून्य स्थान हैं ॥१७॥ विशेषार्थ-इसका कारण यह है कि उक्त प्रवेशस्थान किसी भी कालमें किसी जीवके पाये नहीं जाते है, इसलिए इन्हे शून्य स्थान कहते हैं। और इसीलिए उनके जघन्य और उत्कृष्ट कालको नहीं बतलाया गया। शंका-इक्कीस प्रकृतियोके उदीरकका कितना काल है ? ॥१७१॥ समाधान-जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट काल सातिरेक तेतीस सागरोपम है ॥१७२-१७३॥ - विशेपार्थ-इक्कीस प्रकृतियोके उदीरकका अन्तर्मुहूर्तप्रमाण जघन्य काल इस प्रकार संभव है-चौवीस प्रकृतियोंका उदीरक वेदकसम्यग्दृष्टि दर्शनमोहनीयका क्षय करके इफीस
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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