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________________ ४९१ गा० ६२] उदीरणास्थान-निरूपण डीओ पविसंति' । १५७. अंतरे कदे दो पयडीओ पविसंति । १५८. पुरिसवेदे खविदे एका पयडी पविसदि । १५९. कोधे खविदे माणो पविसदि । १६०. माणे खविदे माया पविसदि । १६१. मायाए खविदाए लोभो पविसदि । १६२. लोभे खविदे अपवेसगो। १६३. एवमणुमाणिय सामित्तं णेदव्यं । चूर्णिसू०-अन्तरकरणके करनेपर पुरुषवेद और संज्वलनकोध ये दो प्रकृतियाँ उदयावलीमे प्रवेश करती हैं ॥१५७॥ विशेषार्थ-अन्तरकरण करनेवाला जीव पुरुपवेद और संज्वलनक्रोध इन दो प्रकृतियोंकी अन्तर्मुहूर्त-प्रमाण प्रथमस्थितिको स्थापित करता है और शेष तीन कषाय और नोकषायोके उदयावलीको छोड़कर अवशिष्ट सर्व द्रव्यको अन्तरके लिए ग्रहण कर लेता है । इस प्रकार अन्तर करता हुआ जिस समय अन्तर समाप्त करता है, उस समय पुरुषवेद और संज्वलनक्रोधकी अन्तर्मुहूर्तप्रमाण प्रथम स्थिति बाकी रहती है। शेष ग्यारह प्रकृतियोकी उदयावलीके भीतर एक समय कम आवलीमात्र गोपुच्छा अवशिष्ट रहती है। पुनः उन प्रकृतियोकी अधःस्थितिके निरवशेष गा देनेपर दो ही प्रकृतियाँ उदयावलीमे प्रवेश करती हैं, क्योकि, पुरुषवेद और संज्वलनक्रोध इन दो प्रकृतियोंको छोड़कर अन्य प्रकृतियोकी प्रथम स्थिति असंभव है। चूर्णिसू०-पुरुषवेदके क्षय हो जानेपर एक संज्वलनक्रोध प्रकृति उदयावलीमे प्रवेश करती है। संज्वलनक्रोधके क्षय हो जानेपर संज्वलनमान उदयावलीमें प्रवेश करता है। संज्वलनमानके क्षय हो जानेपर संज्वलनमाया उदयावलीमे प्रवेश करती है । संज्वलनमायाके क्षय हो जानेपर संज्वलनलोभ उदयावलीमे प्रवेश करता है । संज्वलनलोभके क्षय हो जानेपर यह अप्रवेशक हो जाता है। अर्थात् फिर मोहनीयकर्मकी कोई भी प्रकृति उदयावलीमें प्रवेश नहीं करती है, क्योकि उसकी समस्त प्रकृतियोका क्षय हो जानेसे कोई भी प्रकृति अवशिष्ट नहीं रही है ॥१५८-१६२॥ इस प्रकार स्थानसमुत्कीर्तनाका वर्णन समाप्त हुआ। चूर्णिसू०-इसी समुत्कीर्तनाका आश्रय लेकर स्वामित्वका वर्णन करना चाहिए॥१६३॥ विशेषार्थ-अमुक स्थान संयतोके योग्य हैं और अमुक स्थान असंयतोंके योग्य है। १ पुवुत्तइ गिवीसपवेसगेण खवगसेढिमारूढेण अणियट्टिगुणट्ठाण पविसिय अठ्ठक साएसु खविदेनु तत्तोप्पहुडि जाव अतरकरण ण समयइ ताव चदुस जलण णवणोकसायसण्णिदाओ तेरस पयडीओ तस्स खवगस्स उदयावलिप पविसति त्ति समुक्कित्तिद होइ । जयघ० २ (कुदो,) पुरिसवेद कोहसजलणे मोत्तूणण्णेसिं पढमट्ठिदीए असंभवादो | जयध० ३ णत्ररि कोहपढमट्ठिदीए आवलियमेत्तसेसाए माणसंजलणमोक ड्डिय पढमटिठदि कदि, तत्थु. च्छिछावलियमेत्तकाल दोण्ह पवेमगो होदूण तदो एकिस्से पवेसगो होदि त्ति घेत्तव्वं । लाभे खरिदे पुण ण किंचि कम्म पविसदि, विवक्खियमोहणीयकम्मरस तत्तो परमसभवादो । जयभः
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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