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________________ [ ६ वेदक अर्थाधिकार ४९० कसाय पाहुड सुत्त १५३. एदे वियप्पा कसाय-उवसामणादो परिवदमाणगादो । १५४. एत्तो खवगादो मग्गियव्वा कदि पवेसाणाणि ति । १५५. दंसणमोहणीए खविदे एक्कावीसं पयडीओ पविसंति । १५६. अट्ठकसाएस खविदेसु तेरस पयप्रवेश करती हैं । ये उपर्युक्त विकल्प कपायो के सर्वोपशमसे गिरे हुए जीवकी अपेक्षा से कहे, गये है ।। १५२ - १५३॥ विशेषार्थ - ऊपर जो मोहकर्म के प्रवेशस्थानोका वर्णन किया गया है, वह मोहके सर्वोपशम से गिरकर मिथ्यात्व गुणस्थान तक पहुॅचनेवाले जीवकी अपेक्षा जानना चाहिए । किन्तु जो जीव सर्वोपशमसे गिरते ही मरणको प्राप्त होकर देवोमें उत्पन्न होते हैं, उनकी अपेक्षा कुछ अन्य भी विकल्प संभव है, जो इस प्रकार है- सर्वोपशमसे गिरकर तीन प्रकार के लोभका अपकर्षण करके तीन प्रकृतियोका प्रवेश करनेवाला होकर मरा और देवोमें उत्पन्न हुआ । वहाँ उत्पन्न होनेके प्रथम समय में ही पुरुषवेद, हास्य, रति, भय और जुगुप्सा इन पाँच प्रकृतियांका एक साथ उदय आनेसे आठ प्रकृतियाँ उदयावलीमे प्रवेश करती है । इसी प्रकार सर्वोपशम से गिरकर छह प्रकृतियोका उदयावली मे प्रवेश करके मरणकर देवोमे उत्पन्न होनेवाले जीवके प्रथम समयमें ही उक्त पाँच प्रकृतियो के एक साथ उदयमें आने से ग्यारह प्रकृतियाँ उदयावलीमें प्रवेश करती है । जो जीव सर्वोपशमनासे गिरकर नौ प्रकृतियोका उदयावलीमे प्रवेश कर मरण करता है, उसके देवोमे उत्पन्न होनेके प्रथम समय में चौदह प्रकृतियाँ उदद्यावलीमें प्रवेश करती है । इसी प्रकार जो तीनो क्रोधका भी अपकर्षण करके बारह प्रकृतियोका उद्यावलीमें प्रवेश करके मरण करता है, उसके देवोमें उत्पन्न होनेके प्रथम समयमे' भय और जुगुप्सा के विना शेष तीन प्रकृतियोके उदय आनेसे पन्द्रह प्रकृतियाँ उदयावलीमे प्रवेश करती है । इसी या इसी प्रकारके जीवके भय और जुगुप्सामे से किसी एकके उदय आजानेसे सोलह और दोनो के उदय आजानेसे सत्तरह प्रकृतियाँ उदद्यावलीमें प्रवेश करती हैं । इस प्रकार आठ, ग्यारह, चौदह, पन्द्रह, सोलह और सत्तरह प्रकृतिरूप प्रवेशस्थान देवोमे उत्पन्न होनेके प्रथम समयमें ही पाये जाते हैं । यहॉपर चूर्णिकारने स्वस्थान प्ररूपणा करनेकी अपेक्षा इन्हें नहीं कहा है, ऐसा जानना चाहिए । 1 चूर्णिसू०. ० - अव इससे आगे क्षपककी अपेक्षा कितने प्रवेशस्थान होते है, इस वातकी गवेषणा करना चाहिए | दर्शनमोहनीयकर्मके क्षय हो जानेपर इक्कीस प्रकृतियाँ उद्यावलीमें प्रवेश करती हैं । अप्रत्याख्यानचतुष्क और प्रत्याख्यानचतुष्क इन आठ कपायोके क्षय हो जानेपर अवशिष्ट तेरह प्रकृतियाँ उदद्यावलीमें प्रवेश करती हैं । अर्थात् पूर्वोक्त क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव क्षपकश्रेणीपर चढ़कर नवें गुणस्थानमे प्रवेशकर उक्त आठ कपायोका क्षपण कर उससे आगे जब तक अन्तरकरणको समाप्त नही करता है, तब तक चार संज्वलन कपाय और नव नोकपाय ये तेरह प्रकृतियाँ उद्यावलीम प्रवेश करती है ।। १५४ - १५६॥ * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'एत्तो सत्रणादो मग्गियव्या' इतना हो सूत्र मुद्रित है । आगे के अंगको टीकाका अग बना दिया है । ( देखा पृ० १३९४ )
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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