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________________ गा० ६२] उदीरणास्थान-निरूपण ૪૮૨ १४९. जाधे मिच्छत्तमुदीरेदि ताधे छब्बीसं पयडीओ पविसंति । १५०. तदो से काले अट्ठावीसं पयडीओ पविसंति । १५१. अह सो कसाय-उवसामणादो परिवदिदो दसणमोहणीयस्स उवसंतद्धाए चरिमसमए आसाणं गच्छइ से काले मिच्छत्तमोकड्डमाणयस्स छब्बीसं पयडीओ पविसंति । १५२. तदो से काले अट्ठावीसं पयडीओ पविसंति । कारण यह है कि सासादनगुणस्थानमे उसका उदय नियमसे पाया जाता है। यहाँ यह आशंका नहीं करना चाहिए कि जब अनन्तानुबन्धी कपाय सत्ता मे थी ही नहीं, तब यहाँ उसका बन्ध हुए विना उदय सहसा कहाँसे आगया ? इसका समाधान यह है कि सम्यक्त्वरनरूप पर्वतसे गिरानेवाले परिणामोके कारण अप्रत्याख्यानादि शेष कषायरूप द्रव्य तत्काल ही अनन्तानुबन्धी कषायरूपसे परिणत होकर उदयमें आजाता है । इसके एक समय पश्चात् उदयावलीके वाहिर स्थित शेष तीन अनन्तानुबन्धी कपायोका उदय आजानेसे पच्चीस प्रकृतिरूप प्रवेशस्थान पाया जाता है। चूर्णिसू०-जिस समय उक्त जीव मिथ्यात्वप्रकृतिकी उदीरणा करता है, उस समय छब्बीस प्रकृतियाँ उदयावलीमे प्रवेश करती है। ( क्योकि सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृतिको उस जीवने उदयावलीके बाहिर निक्षिप्त किया है।) इसके एक समय पश्चात् ही सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृतिके उदयावलीमे आजानेसे मोहकी अट्ठाईस प्रकृतियाँ प्रवेश करती हैं, अर्थात् सभी प्रकृतियोका उदय हो जाता है ॥ १४९-१५०॥ अब दर्शनमोहनीयके उपशमनकालके अन्तिम समयमे सासादनगुणस्थानको प्राप्त होनेवाले जीवके प्रवेशसम्बन्धी विशेषता बतलानेके लिए चूर्णिकार उत्तर सूत्र कहते है चूर्णिमू०-अथवा कषायोपशमनासे गिरा हुआ वह जीव यदि दर्शनमोहनीयके उपशमनकालके अन्तिम समयमे सासादनगुणस्थानको प्राप्त होता है, तो तदनन्तर समयमे मिथ्यात्वकी उदीरणा करनेपर उसके छब्बीस प्रकृतियॉ उदयावलीमे प्रवेश करती है ॥१५१॥ विशेषार्थ-जो उपशमश्रेणीसे गिरा हुआ उपशमसम्यग्दृष्टि जीव उपशमसम्यक्त्वके कालमें एक समयमात्र शेष रह जानेपर सासादनगुणस्थानको प्राप्त होता है, वह किसी एक अनन्तानुबन्धीकषायके उदयसे बाईस प्रकृतियोका उदयावलीमे प्रवेश करेगा और शेप तीन अनन्तानुबन्धी प्रकृतियोंको उदयावलीके वाहिर ही निक्षिप्त करेगा। दूसरे ही समयमे वह गिरकर मिथ्यात्वगुणस्थानको प्राप्त होगा, वहाँ एक साथ ही मिथ्यात्वप्रकृति और शेप तीन अनन्तानुबन्धी कषाय इन चार प्रकृतियोंका उदय आनेसे छब्बीस प्रकृतिरूप ही प्रवेशस्थान पाया जाता है । पूर्वोक्त जीवके समान उसके पच्चीस प्रकृतिरूप प्रवेशस्थान नहीं पाया जाता है, ऐसा अभिप्राय जानना चाहिए। चूर्णिसू०-तदनन्तर कालमे अर्थात् मिथ्यात्वगुणस्थानमे पहुँचनेक द्वितीय समयमें ही सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृतिका उद्य आजानेसे अट्ठाईस प्रकृतियाँ उदयावलीमे ८२
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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