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________________ कसाय पाहुड सुन्त [ ६ वेदक अर्थाधिकार वदमाणयस्स' । १४६. जाधे अंतरं विणङ्कं तत्तो पाए एकवीसं पयडीओ पविसंति जाय सम्मत्तमुदरंतो सम्मत्तमुदए देदि, सम्मामिच्छत्तं मिच्छतं च आवलियबाहिरे णिक्खिवदि, ताधे वावी पयडीओ पविसंति । १४७. से काले चडवीसं पयडीओ पविसंति । १४८. जइ सो कसायउवसामणादो परिवदिदो दंसणमोहणीय-उवसंतद्धाए अचरिमेसु समएस आसाणं गच्छइ, तदो आसाणगमणादो से काले पणुवीसं पयडीओ पविसंति । तियाँ उदद्यावली में प्रवेश करती हैं । जब उपशमसम्यक्त्वका काल समाप्त हो जाता है, तव सम्यक्त्वप्रकृतिकी उदीरणा करके सम्यक्त्व प्रकृतिको उदयावलीमे देता है और सम्यग्मिथ्यात्व तथा मिथ्यात्व प्रकृतिको उदयावली के बाहिर निक्षिप्त करता है । उस समय बाईस प्रकृतियाँ उदद्यावलीमें प्रवेश करती है । यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए कि जिस प्रकार सम्यक्त्वप्रकृतिकी उदीरणाकर उदयावलीमे देनेपर वाईस प्रकृतिरूप प्रवेशस्थान बनता है, उसी प्रकार मिथ्यात्व या सम्यग्मिथ्यात्वकी उदीरणा करनेवाले जीवके भी बाईस प्रकृतिरूप प्रवेशस्थान पाया जाता है । ) तदनन्तर समयमे चौवीस प्रकृतियाँ प्रवेश करती है । अर्थात् जिन दो दर्शनमोहनीय प्रकृतियोको उदद्यावलीके वाहिर निक्षिप्त किया था, एक क्षण पश्चात् उनके उदद्यावलीमें आ जानेपर चौबीस प्रकृतिरूप स्थान पाया जाता है ।।१४५-१४७॥ ४८८ · चूर्णिसू० - यदि वह जीव कपायोपशमनासे गिरकर दर्शनमोहनीयके उपशमन-कालके अचरिम समयोमे सासादनगुणस्थानको प्राप्त होता है, तब सासादनगुणस्थान में पहुँचने के एक समय पश्चात् पच्चीस प्रकृतियाँ उदयावली मे प्रवेश करती है ॥ १४८॥ विशेषार्थ - कषायोके सर्वोपशम से गिरे हुए चतुर्थ गुणस्थानवर्ती उपशमसम्यग्दृष्टि जीवके उपशमसम्यक्त्वके कालमे छह आवलीकालसे लेकर एक समय अवशिष्ट रहने तक सासादन गुणस्थान होना संभव है । यहाँ अन्तिम समय मे सासादनगुणस्थानको प्राप्त होनेवाले जीवकी विवक्षा नही की गई है, यह बात 'अचरिम समयोमे' इस पदसे प्रकट होती है, क्योकि उसकी प्ररूपणा में कुछ विभिन्नता है । जो जीव द्विचरम समय से लेकर छह आवली - कालके भीतर सासादन गुणस्थानको प्राप्त होता है, उसके सासादनभावको प्राप्त होने के प्रथम समयमे ही अनन्तानुबन्धी किसी एक कपायके उदय आजानेसे बाईस प्रकृतिरूप प्रवेशस्थान पाया जाता है । अनन्तानुबन्धीचतुष्कमेसे किसी एक कपायके उदयमे आनेका तो वि परिसेसियण्णाएण तदुवलभो १ जइ वि एत्थ उवसंतदंसणमोहणीयस्सेत्ति सुत्ते ण वुत्त, दठव्वो । जयघ० २ एतदुक्त भवति - अतरविणासाण तरमेव समुवलद्ध सरुवस्स इगिवीसपवेसठाणस्स ताव अवटूट्ठाप होइ जाव उवसंतसम्मत्तकालच रिमसमयो त्ति । तत्तो पर मुवसमसम्मत्तद्वाक्खएण सम्मत्तमुदरेमाणेण सम्मत्त उदए दिण्णे मिच्छत्त सम्मामिच्छत्तसु च आवलियवाहिरे णिक्खित्तसु तक्काले वावीसपवेसट्ठाणमुप्पत्ती जायदिति । ण केवल सम्मत्तमुदीरेमाणस्स एस कमो, किंतु मिच्छत्त सम्मामिच्छत्त वा उदीरेमाणस्स वि एदेणेव कमेण वावीसपवेसट्टाणुप्पत्ती वत्तव्याः सुत्तस्सेदस्स देसामासयत्ताढो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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