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________________ ४८७ गा० ६२] उदीरणा-स्थान-निरूपण णीयाणि उदयावलियबाहिरे णिक्खित्ताणि । ताधे तेरस पयडीओ पविसंति । १३८. से काले एगूणवीसं पयडीओ पविसंति । १३९. तदो अंतोमुहुत्तेण इत्थिवेदमोकड्डिऊण उदयावलियबाहिरे णिक्खिवदि । १४०. से काले चीसं पयडीओ पविसंति। १४१. ताव, जाव अंतरंण विणस्सदि त्ति । १४२. अंतरे विणासिज्जमाणे णqसयवेदमोकड्डिदूण उदयावलियबाहिरे णिक्खिवदि । १४३. से काले एकवीसं पयडीओ पविसंति । १४४. एत्तो पाए जइ खीणदंसणमोहणीयो, एदाओ एकवीसं पयडीओ पविसंति जाव अक्खवग-अणुवसामगो ताव । १४५. एदस्स चेव कसायोक्सामणादो परिवेदनीयका अपकर्षण करता है। इनमेसे पुरुषवेदको उदयमे देता है और छहो नोकपायवेदनीयप्रकृतियोको उदयावलीके बाहिर निक्षिप्त करता है । उस समय पूर्वोक्त दशमे शेष दोनो क्रोध, और पुरुषवेदके मिल जानेसे तेरह प्रकृतियाँ प्रवेश करती है। तदनन्तर समयमे हास्यादिषट्कके भी उद्यावलीमे आजानेसे उन्नीस प्रकृतियाँ प्रवेश करती है। इसके अन्तमुहूर्त पश्चात् स्त्रीवेदका अपकर्पण करके उदयावलीके वाहिर निक्षिप्त करता है। (क्योकि यह कथन पुरुषवेदके उदयके साथ उपशमश्रेणीपर चढ़े हुए जीवकी अपेक्षासे किया जा रहा है ।) तदनन्तर समयमे उक्त उन्नीस प्रकृतियोमे स्त्रीवेदके और मिल जानेसे वीस प्रकृतियाँ प्रवेश करती है। इस स्थानपर जबतक अन्तरका विनाश नहीं हो जाता है, तब तक यही बीस प्रकृतिरूप प्रवेशस्थान बराबर अवस्थित रहता है । अन्तरके विनाश हो जानेपर नपुंसकवेदका अपकर्पणकर उदयावलीके बाहिर उसे निक्षिप्त करता. है । तदनन्तर समयमे नपुंसकवेदके मिल जानेसे इक्कीस प्रकृतियाँ प्रवेश करती है ॥१३०-१४३॥ चूर्णिसू०-इस स्थलपर यदि वह जीव क्षपित-दर्शनमोहनीय अर्थात् क्षायिकसम्यग्दृष्टि है, तो ये इक्कीस प्रकृतियाँ तब तक उदयावलीमे प्रवेश करती है, जब तक कि वह अक्षपक या अनुपशमक रहता है ॥१४४॥ विशेपार्थ-उपशमश्रेणीसे गिरा हुआ क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव अप्रमत्तसंयत, प्रमत्तसंयत, संयतासंयत्त और असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानमे जितने कालतक रहता है, उतने कालतक इक्कीस प्रकृतिरूप प्रवेशस्थान बराबर पाया जाता है । आगे उपशम या क्षपक श्रेणीपर चढ़नेपर ही उसका विनाश होता है, ऐसा जानना चाहिए । अब उपशमसम्यग्दृष्टिकी अपेक्षा जो अन्य प्रवेशस्थान पाये जाते है, उन्हे वतलानेके लिए चूर्णिकार उत्तर सूत्र कहते है चूर्णिसू०-कपायोपशामनासे गिरनेवाले उपशमसम्यग्दृष्टि जीवके जो कुछ विभिनता है, उसे कहते है । जिस समय अन्तर विनष्ट हो जाता है, उस स्थानपर इक्कीस प्रकृ १ कुदो, पुरिसवेदोदएण चढिदत्तादो। ण च सोदएण विणा उदयादिणिक्खेवसभवो; विप्पडिसेहादो । जयध० २ कुदो, उदयावलियवाहिरे णिक्खित्तस्स इस्थिवेदस्स ताधे उदयावल्यिभतरपवेमदसणादो | जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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