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________________ ४८६ कसाय पाहुड सुत्त [६ वेदक-अर्थाधिकार परिवदंतेण तिविहो लोहो ओकड्डिदो । तत्थ लोभसंजलणमुदए दिण्णं, दुविहो लोहो उदयावलियबाहिरे णिक्खित्तो । ताधे एका पयडी पविसदि । १३१. से काले तिण्णि पयडीओ पविसंति । १३२. तदो अंतोमुहुत्तेण तिविहा माया ओकड्डिदा । तत्थ मायासंजलणमुदए दिण्णं, दुविहमाया उदयावलियबाहिरे णिक्खित्ता । ताधे चत्तारि पयडीओ पविसंति ।। १३३. से काले छप्पयडीओ पविसंति । १३४. तदो अंतोमुहुत्तेण तिविहो माणो ओकड्डिदो, तत्थ माणसंजलणमुदये दिणं, दुविहो पाणो आवलिबाहिरे णिखित्तो। ताधे सत्त पयडीओ पविसंति । १३५. से काले णव पयडीओ पविसंति । १३६. तदो अंतोमुहुत्तेण तिविहो कोहो ओकड्डिदो । तत्थ कोहसंजलणमुदए दिण्णं, दुविहो कोहो उदयावलियबाहिरे णिक्खित्तो, ताधे दस पयडीओ पविसंति । से काले वारस पयडीओ पविसंति । १३७, तदो अंतोमुहुत्तेण पुरिसवेद-छण्णोकसायवेदणीयाणि ओकड्डिदाणि । तत्थ पुरिसवेदो उदए दिण्णो । छण्णोकसायवेद विशेषार्थ-उपर असंयतोके योग्य स्थान बतलाकर अव संयतोके योग्य उदीरणास्थानोंका वर्णन करनेकी चूर्णिकार प्रतिज्ञा कर रहे है। संयत दो प्रकारके होते हैं-उपशामक संयत और क्षपक संयत । इन दोनोके स्थानोका वर्णन करना एक साथ असंभव है, अतः पहले उपशामक-संयतोंके योग्य उदीरणास्थानोको कहते है । चूर्णिसू०-उपशामनासे अर्थात् मोहकर्मका सर्वोपशम करके ग्यारहवे गुणस्थानसे गिरता हुआ जीव दशवे गुणस्थानके प्रथम समयमें तीन प्रकारके लोभका अपकर्पण करता है । उसमेंसे संज्वलन लोभको उदयमें देता है, तथा अप्रत्याख्यान और प्रत्याख्यान इन दोनो लोभोंको उदयावलीके बाहिर निक्षिप्त करता है, उस समय एक संज्वलनलोभ प्रकृति उदयावलीमें प्रवेश करती है। तदनन्तर समयमे पूर्वोक्त दोनो लोभोके मिल जानेसे तीनो लोभ प्रकृतियाँ उदयावलीमे प्रवेश करती हैं । इसके अन्तर्मुहूर्त पश्चात् तीनो मायाकपायोका अपकर्पण करता है । उनमेंसे संज्वलन मायाको उदयमे देता है और शेप दोनो मायाकपायोको उदयावलीके बाहिर स्थापित करता है। उस समय चार प्रकृतियाँ उदयावलीमे प्रवेश करती है । तदनन्तर समयमे तीनो लोभ व तीनो मायारूप छह प्रकृतियाँ प्रवेश करती है । इसके अन्तर्मुहूर्त पश्चात् तीनो प्रकारके मानका अपकर्पण करता है। उनमेसे संज्वलन मानको उदयमे देता है और शेष दोनो प्रकारके मानोको उदयावलीके वाहिर निक्षिप्त करता है । उस समय तीन लोभ, तीन माया और संज्वलनमान ये सात प्रकृतियाँ प्रवेश करती है । तदनन्तर कालमें शेप दोनो मानकपायोके मिलनेपर नौ प्रकृतियाँ प्रवेश करती है। इसके अन्तर्मुहूर्त पञ्चात् तीनो प्रकारके क्रोधका अपकर्पण करता है। उनमेसे संज्वलन क्रोधको उदयमे देता है और शेष दोनो प्रकारके क्रोधोको उदयावलीके बाहिर निक्षिप्त करता है । उस समय दश प्रकृतियाँ प्रवेश करती है। तदनन्तर समयमे दोनो क्रोध मिलनेपर बारह प्रकृतियाँ प्रवेश करती है। इसके अन्तर्मुहुर्त पश्चात् पुरुपवेद, और हास्यादि छह नोकपाय
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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