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________________ गा० ६२] उदीरणा-स्थान-निरूपण ४८५ १२५. तेवीसं पयडीओ उदयावलियं पविसंति मिच्छत्ते खविदे । १२६. वावीसं पयडीओ उदयावलियं पविसंति सम्मामिच्छत्ते खविदे। १२७. एकवीसं पयडीओ उदयावलियं पविसंति दसणमोहणीए खविदे । १२८. एदाणि हाणाणि असंजदपाओग्गाणि । १२९ एत्तो उवसामगपाओग्गाणि ताणि भणिस्सामो। १३०. उवसामणादो विशेषार्थ-चौबीस प्रकृतियोकी सत्तावाले वेदकसम्यग्दृष्टि या सम्यग्मिथ्यादृष्टिके चौबीस प्रकृतिरूप स्थानकी उदीरणा होती है। तथा विसंयोजनाके पश्चात् मिथ्यात्व गुणस्थानमे आनेवाले मिथ्यादृष्टि के भी प्रथम समयमे यह उदीरणास्थान पाया जाता है। चूर्णिसू०-मिथ्यात्वके क्षय हो जाने पर तेईस प्रकृतियाँ उद्यावलीमें प्रवेश करती हैं। उनमेसे सम्यग्मिथ्यात्वके क्षय हो जानेपर वाईस प्रकृतियाँ उदयावलीमे प्रवेश करती हैं। दर्शनमोहनीयके क्षय हो जानेपर इक्कीस प्रकृतियाँ उदयावलीमे प्रवेश करती हैं ॥१२५-१२७॥ विशेषार्थ-दर्शनमोहनीयकी क्षपणाके लिए उद्यत उक्त वेदकसम्यग्दृष्टिके मिथ्यात्वके क्षयकर देनेपर तेईस प्रकृतियोका, अन्तर्मुहूर्त पश्चात् सम्यग्मिथ्यात्वके क्षय कर देनेपर बाईस प्रकृतियोंका और अन्तर्मुहूर्त पश्चात् सम्यक्त्वप्रकृतिके क्षयकर देनेपर इक्कीस प्रकृतियोका उदीरणास्थान पाया जाता है । यहाँ इतना विशेष है कि अनन्तानुवन्धी कपाय-चतुष्टयकी विसंयोजना और दर्शनमोहनीय-त्रिककी उपशमनाकर उपशमसम्यक्त्व प्राप्त करनेवाले औपशमिकसम्यग्दृष्टिके मिथ्यात्व, अनन्तानुवन्धी, सम्यग्मिथ्यात्व या सम्यक्त्वप्रकृतिमेसे किसी एक प्रकृतिके उदय आनेपर विवक्षित गुणस्थानकी प्राप्तिके प्रथम समयमे भी वाईस प्रकृतियोका उदीरणास्थान पाया जाता है। इसी प्रकार अनन्तानुवन्धी-चतुष्ककी विसंयो. जना पूर्वक दर्शनमोह-त्रिकका उपशम करनेवाले औपशमिकसम्यग्दृष्टिके भी इक्कीस प्रकृतिरूप उदीरणास्थान पाया जाता है । चूर्णिकारने यहाँ इन दोनो प्रकारोकी विवक्षा नहीं की है, ऐसा अभिप्राय जानना चाहिए । चूर्णिसू०-ये सब उपर्युक्त स्थान असंयतोके योग्य हैं ॥१२८।। विशेषार्थ-ऊपर कहे गये अट्ठाईस, सत्ताईस, छब्बीस, पच्चीस, चौवीस, तेईस, बाईस और इक्कीस प्रकृतिरूप आठ उदीरणास्थान असंयत जीवोके होते हैं। चूर्णिकारका यह कथन असंयतोके योग्य उदीरणास्थानोके निर्देशके लिए है, अतः उक्त सभी स्थान असंयतोके ही होते है, ऐसा अवधारण नहीं करना चाहिए, क्योकि सत्ताईस प्रकृतिरूप उदीरणास्थानको छोड़कर शेप सात स्थान यथासंभव संयतोमे भी पाये जाते हैं। चूर्णिसू०-अब इससे आगे उपशामक-प्रायोग्य जो स्थान हैं, उन्हे कहेगे ॥१२९॥ १ एसो एक्को पयारो सुत्तयारेण णिहिट ठो त्ति पयारतरेण वि एदस्स सभवविसयो अणुमग्गियचो, अणताणुबधिणो विसजोइय इगिवीसपवेसयभावेणावठ्ठिदत्स उवसमसम्माइट्टिस्स मिच्छत्तवेदयसम्मत्तसम्मामिच्छत्त-सासणसम्मत्ताणमण्णदरगुणपडिवत्तिपढमसमए पयदट्ठाणसभवणियमदसणादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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