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________________ ૩૮૨ कसाय पाहुड सुत [ ६ वेदक अर्थाधिकार १०८. णाणाजीवेहि भंगविचयादि-अणियोगद्दाराणि अप्पा बहुअवज्जाणि कायव्वाणि । + १०९. अप्पाचहुअं । ११० सव्वत्थोवा अवत्तच्चपवेसगा' । १११. भुजगारपवेसगा अनंतगुणा । ११२. अप्पदरपवेसगा बिसेसाहियाँ । ११३. अवट्टिद पवेसगा असंखेज्जगुण । ११४. पदणिक्खेव वड्डीओ कादव्वाओ । तदो 'कदि आवलियं पवेसेड' चि पदं समत्तं । एवं पयडि- उदीरणा समत्ता | चूर्णिसू०. ० - नाना जीवोकी अपेक्षा भंगविचयको आदि लेकर अल्पबहुत्वके पूर्ववर्ती अनुयोगद्वारोंकी श्ररूपणा करना चाहिए || १०८ ॥ चूर्णि सू० - अव भुजगार- उदीरको के अल्पबहुत्वको कहते है - अवक्तव्य - उदीरक सबसे कम है । (क्योकि सर्वोपशम करके गिरनेवाले जीव संख्यात ही पाये जाते है । ) अवक्तव्यउदीरकोसे भुजाकार - उदीरक अनन्तगुणित हैं । ( क्योकि, यहॉपर द्विसमय- संचित एकेन्द्रियजीवराशिका प्रधानता से ग्रहण किया गया है ।) भुजाकार - उदीरकोसे अल्पतर- उदीरक विशेष अधिक है । ( यद्यपि भुजाकार - उदीरक और अल्पतर- उदीरक सामान्यतः समान है, तथापि सम्यक्त्वको उत्पन्न करनेवाले अनादिमिध्यादृष्टियोके साथ दर्शनमोह और चारित्रमोहका क्ष्यकर अल्पतर-उदीरक जीवोकी संख्या के कुछ अधिक होनेसे यहाॅ अल्पतर- उदीरक भुजाकार- उदीरकोसे विशेप अधिक बताये गये है । ) अल्पतर- उदीरकोसे अवस्थित - उदीरक असंख्यातगुणित है । ( क्योकि अवस्थित - उदीरणाका काल अन्तर्मुहूर्त है, उसमें संचित होनेवाली एकेन्द्रिय जीवरागिकी यहाँ प्रधानता होनेसे अल्पतर- उदीरको से अवस्थित - उदीरकोको असंख्यातगुणित कहा गया है ।। १०९ - ११३॥ चूर्णिसू० - यहॉपर पदनिक्षेप और वृद्धिकी प्ररूपणा करना चाहिए ॥११४॥ इस प्रकार 'कदि आवलियं पवेसेइ' पहली गाथाके इस प्रथम चरणकी व्याख्या समाप्त हुई और इस प्रकार प्रकृतिस्थान - उदीरणाकी प्ररूपणा समाप्त होती है । देणादि कादूणतरिदो किंचूणमद्धपोग्गलपरियहं परियट्टिदूण थोवावसेसे ससारे पुणो वि सव्वविसुद्धो होदूण उवसमसेटिमारुढो पडिवादपढमसमए लडमतर करेदि त्ति वत्तव्व । जयध० १ किं कारण, उवसमसेढीए सव्वोवसम काढूण परिवदमाणजीवेसु चेव तदुवलभादो । जयध० २ कि कारण; दुसमयस चिदेइ दियजीवाणमेत्थ पहाणभावेणावलवणादो | जयघ० ३ कि कारण; मिच्छत्त पडिवज्जमाणसम्माइट्ठीण सम्मत्त पडिवज्जमाणमिच्छा इट्ठीण च जहाकम भुजगारप्पदर परिणदाण सत्याणमिच्छाइट्ठीण च सव्वत्य भुजगारप्पदरपवेसगाण समाणत्ते सते विसम्मत्त - मुप्पाएमाणाणादियमिच्छाइट्ठीहि सह दसण चारित्तमो हक्खवयजीवाण भुजगारेण विणा अप्पदरमेव कुणमाणामेत्था हियत्तदसणादो | जयध० ४ किं कारण; अंतोमुहुत्तमं चिदेइंटियरासिम्स पहाणत्तादो । जयध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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