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________________ गा० ६२] वेदक-भुजाकार-अन्तर-निरूपण ४८१ १०५, अवत्तव्यपवेसगंतरं केवचिरं कालादो होदि १ १०६. जहण्णेण" अंतोमुहुत्तं'। १०७. उक्कस्सेण उबड्डपोग्गलपरियट्ट । है । अब अल्पतर-उदीरकका उत्कृष्ट अन्तर कहते है-नौ या दश प्रकृतियोंकी उदीरणा करनेवाले जीवके भय-जुगुप्साकी उदीरणाके विना अल्पतर उदीरणारूप पर्यायसे परिणत होनेके अनन्तर समयमें अन्तरको प्राप्त होकर अन्तमुहूर्त के पश्चात् भय और जुगुप्साकी उदीरणा करने पर फिर भी अन्तमुहूर्त तक अन्तरित रहनेवाले जीवके अन्तमुहूर्तप्रमाण उत्कृष्ट अन्तर सिद्ध होता हैं । अथवा उपशमश्रणीपर चढ़कर स्त्रीवेदकी उदीरणा-व्युच्छेद करके अल्पतर-उदीरक बनकर अन्तरको प्राप्त हो, ऊपर चढ़कर और नीचे गिरकर, भय-जुगुप्साकी उदीरणा प्रारंभ कर अन्तर्मुहूर्त तक उदीरणा करने पर उत्कृष्ट अन्तर सिद्ध हो जाता है । अब अवस्थित-उदीरकका उत्कृष्ट अन्तर कहते हैं-संज्वलन लोभकी उदीरणा करनेवाला उपशामक अवस्थित उदीरणाका आदि करके अनुदीरक बन अन्तर्मुहूर्त तक अन्तरित रह कर पुनः उतरता हुआ सूक्ष्मसाम्परायसंयत होकर और दूसरे समयमे मरकर देवोमे उत्पन्न हो यथाक्रमसे दो समयोमें भय और जुगुप्साकी उदीरणा कर तत्पश्चात् अवस्थित-उदीरक हुआ । इस प्रकार उत्कृष्ट अन्तर सिद्ध हो जाता है । शंका-अवक्तव्य-उदीरकका अन्तरकाल कितना है ? ॥१०५॥ समाधान-जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तरकाल उपाधपुद्गलपरिवर्तन है ॥१०६-१०७॥ विशेषार्थ-कोई संयत उपशमश्रेणीपर चढ़कर सर्वोपशमनासे गिरनेके प्रथम समयमे अवक्तव्य उदीरणाका प्रारम्भ कर और नीचे गिरकर अन्तरको प्राप्त हुआ। पुनः सर्वलघु अन्तर्मुहूर्त के द्वारा उपशमश्रेणीपर चढ़कर और वहाँसे गिरकर सूक्ष्मसाम्परायकी चरमावलीके प्रथम समयमें एक प्रकृतिका उदीरक बनके और वहीं पर मरण करके उसके देवोमें उत्पन्न होनेके प्रथम समयमे अन्तर्मुहूर्तप्रमाण जघन्य अन्तर उपलब्ध हो जाता है। उत्कृष्ट अन्तरकी प्ररूपणा इस प्रकार है-कोई विवक्षित जीव संसारके अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण अवशिष्ट रहनेके प्रथम समयमे सम्यक्त्वको उत्पन्नकर सर्वलघु अन्तर्मुहूर्त के द्वारा तत्काल उपशमश्रेणीपर चढ़कर गिरा और दशवे गुणस्थानमे अवक्तव्य उदीरक वनके अन्तरको प्राप्त हुआ । पश्चात् कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन तक संसार में परिभ्रमणकर संसारके अल्प शेष रह जानेपर पुनः सर्व विशुद्ध होकर उपशमश्रणीपर चढ़कर और वहाँसे गिरनेपर एक प्रकृतिकी उदीरणाके प्रथम समयमे उत्कृष्ट अन्तरको प्राप्त हुआ । इस प्रकार उपाधपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण उत्कृष्ट अन्तरकाल सिद्ध हो जाता है । १ त जहा-उवसमसेढिमारुहिय सव्वोवसामणापडिवादपढमसमए अवत्तव्यस्सादि कादूण हेट्टा णिवदिय अतरिदो। पुणो वि सव्वलहुमतोमुहुत्तेण उवसमसेढिमारोहण कादूण सुहुमसापराइयचरिमावलियपढमसमए अपवेसगभावमुवणमिय तत्थेव काल कादूण देवेसुप्पण्णपढमसमए लद्धमतर करेदि; पयारतरेण जहण्णतराणुप्पत्तीदो। जयध० २ तं कथ, अद्धपोग्गलपरियपढमसमए सम्मत्तमुप्पाइय सव्वलहुमुवसममेढिसमारोहणपुरस्सरपडिवा.
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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