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________________ गा० ६२ ] उदीरणा-स्थान-निरूपण ११५. 'कदि च पविसंति कस्स आवलियं' ति ? ११६. एत्थ पुव्वं गमणिजा ठाणसमुक्तित्तणा पयडिणिदेसो च । ११७. ताणि एकदो भणिस्संति । ११८. अट्ठावीसं पयडीओ उदयावलियं पविसंति । ११९. सत्तावीसं पयडीओ उदयावलियं पविसंति सम्मत्ते उव्वेल्लिदे । १२०. छब्बीसं पयडीओ उदयावलियं पविसंति सम्मत्तसम्मामिच्छत्तेसु उव्वेल्लिदेसु। चूर्णिसू०-अब पहली गाथाके 'कदि च पविसंति कस्स आवलियं' इस द्वितीय चरणकी व्याख्या की जाती है। यहॉपर पहले स्थानसमुत्कीर्तना और प्रकृतिनिर्देश गमनीय अर्थात् ज्ञातव्य है, अतः ये दोनो एक साथ कहे जावेगे ॥११५-११७॥ विशेषार्थ-पहली गाथाके दूसरे चरणमे प्रकृतिप्रवेशका निर्देश किया गया है उदयावलीके भीतर प्रकृतियोके प्रवेश करनेको प्रकृतिप्रवेश कहते है। प्रकृतिप्रवेशके दो भेद हैं-मूलप्रकृतिप्रवेश और उत्तरप्रकृतिप्रवेश । उत्तरप्रकृतिप्रवेशके भी दो भेद हैं-एकैकोत्तरप्रकृतिप्रवेश और प्रकृतिस्थानप्रवेश । इसमे मूलप्रकृतिप्रवेश और एकैकोत्तरप्रकृतिप्रवेशके सुगम होनेसे चुर्णिकारने उनकी प्ररूपणा नहीं की है। यहाँ प्रकृतिस्थानप्रवेश विवक्षित है । उसका वर्णन आगे समुत्कीर्तना आदि सत्तरह अनुयोगद्वारोसे किया जायगा, ऐसा अभिप्राय मनमे रख कर चूर्णिकार पहले समुत्कीर्तना अनुयोगद्वारका प्ररूपण कर रहे है । समुत्कीर्तना के दो भेद हैं-स्थानसमुत्कीर्तना और प्रकृतिसमुत् कीर्तना। अट्ठाईस प्रकृतिरूप स्थानको आदि लेकर गुणस्थान और मार्गणास्थानोंके द्वारा इतने प्रकृतिस्थान उदयावलीके भीतर प्रवेश करते हैं, इस प्रकारकी प्ररूपणा करनेको स्थानसमुत्कीर्तना कहते हैं । इतनी प्रकृतियोको ग्रहण करनेपर यह अमुक या विवक्षित प्रकृतिस्थान उत्पन्न होता है, इस प्रकारके वर्णन करनेको प्रकृतिसमुत्कीतना कहते है। इसीका दूसरा नाम प्रकृतिनिर्देश है। चूर्णिकार इन दोनोंका एक साथ वर्णन करेगे। चूर्णिसू०-मोहकर्मकी अट्ठाईस ( सभी ) प्रकृतियाँ उदयावलीमें प्रवेश करती है। इनमेसे सम्यक्त्वप्रकृतिकी उद्वेलना करने पर मोहकर्मकी शेप सत्ताईस प्रकृतियाँ उदयावलीमे प्रवेश करती है। सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना करनेपर शेप छब्बीस प्रकृतियाँ उदयावलीमें प्रवेश करती है ॥११८-१२०॥ १ तत्थ ठाणसमुक्तित्तणा णाम अट्ठवीसाए पयडिट्ठाणमादि कादूण ओघादेसेहि एत्तियाणि पयडिट्ठाणाणि उदयावलिय पविसमाणाणि अस्थि त्ति परूवणा । पयडिणिद्द सो णाम एदाओ पयडीओ घेत्तूणेद पवेसट्ठाणमुप्पज्जइ त्ति णिरूवणा । जयध० २ ण केवलमुव्वेलिदसम्मत्त-सम्मामिच्छत्तस्सेव, किंतु अणादियमिच्छाइwिणो वि छब्बीसाए पवेसट्ठाणमस्थि त्ति घेत्तव्य । अठ्ठावीस-सत्तावीसाणमण्णदरसतकम्मियमिच्छाइट्ठिणा वा उवसमसम्मत्ताहिमुद्देणतर कादूण सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमावलियमेत्तपढमट्टिदीए गलिदाए छन्वीसपवेसठाणमुवलब्भइ । उवसमसम्माइwिणा पणुवीसपवेसगेण मिच्छत्त-सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमण्णदरे ओकड्डिदे सासणसम्माइट्ठिणा वा मिच्छत्ते पडिवण्णे एयसमय छव्वीसाए पवेसट्ठाणमुवलन्भइ । णवरि सुत्ते सम्मत्त सम्मामिच्छत्तसु उन्वेल्लिदेसु त्ति णिसो उदाहरणमेत्तो; तेणेदेसि पि पयाराण संगहो काययो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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