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________________ कसाय पाहुड सुत्त [ ६ वेदक अर्थाधिकार ६७. अप्पाबहुअं । ६८. सव्वत्थोवा एक्किस्से पवेसगा' । ६९. दोन्हं पवेसगा संखेज्जगुणा' । ७०. चउन्हं पयडीणं पवेसगा संखेज्जगुणा । ७१. पंचन्हं पयडीणं पवेसगा असंखेज्जगुणा । ७२. छहं पयडीणं पवेसगा असंखेज्जगुणा । ७३ सत्तण्हं पयडीणं पवेसगा असंखेज्जगुण । ७४. दसहं पयडीणं पवेसगा अनंतगुणाँ । ७५. णवण्हं पयडीणं पवेसगा संखेज्जगुण । ७६. अट्टहं पयडीणं पवेसगा संखेज्जगुणा' । ७७. णिरयगदीए सव्वत्थोवा छण्हं पयडीणं पवेसगा । ७८. सत्तण्हं पयडीणं चूर्णिसू० ( ७ - अब उदीरणास्थानोका अल्पबहुत्व कहते है - एक प्रकृतिरूप स्थानकी उदीरणा करनेवाले सबसे कम है । एक प्रकृतिरूप स्थानके उदीरकोसे दो प्रकृतिरूप स्थानकी उदीरणा करनेवाले संख्यातगुणित हैं । दो प्रकृतिरूप स्थानके उदीरकोसे चार प्रकृतिरूप स्थानकी उदीरणा करनेवाले संख्यातगुणित है । चारप्रकृतिरूप स्थानके उदीरकोसे पाँच प्रकृतिरूप स्थानकी उरण करनेवाले असंख्यातगुणित हैं | पाँचप्रकृतिरूप स्थानके उदीरकोसे छह प्रकृतिरूप स्थानकी उदीरणा करनेवाले असंख्यातगुणित है । छह प्रकृतिरूप स्थानके उदीरकोसे सात प्रकृतिरूप स्थानकी उदीरणा करनेवाले असंख्यातगुणित है । सात प्रकृतिरूपस्थान के उदीरकोंसे दश प्रकृतिरूप स्थानकी उदीरणा करनेवाले अनन्तगुणित है । दशप्रकृतिरूप स्थानके उदीरकोसे नौ प्रकृतिरूप स्थानकी उदीरणा करनेवाले संख्यातगुणित हैं। नौ प्रकृतिरूपस्थानके उदीरको से आठ प्रकृतियोकी उदीरणा करनेवाले संख्यातगुणित है ॥ ६७-७६॥ ४७६ चूर्णिसू० - नरकगतिमे छह प्रकृतियोकी उदीरणा करनेवाले सबसे कम हैं । छह प्रकृतिरूप स्थानके उदीरकोसे सात प्रकृतियोकी उदीरणा करनेवाले असंख्यातगुणित है | १ कुदो, सुहुमसा पराइयद्धाए अणियट्टियद्धासखेजदिभागे च सचिदखवगोवसामगजीवाणमिहग्गहणादो | जयध० २ कुदो; अणि पिढमसमयप्पहुडि तदद्वाए सस्तेजेसु भागेसु सचिदखवगोवसा मगजीवाणमिहावलवणादो | जयघ ३ किं कारण; उवसम खइय सम्माइट्टिस्स पमत्तापमत्तसजदाणमपुव्वकरणखवगोवसामगाण च भयदुगु छोदयविरहिदाणमेत्थ गहणादो | जयध० ४ कुदो, उवसम खइयसम्मा इट्रिग्सजदा सजदरा सिस्स मखेनाण भागाणमेत्थ पहाणभावेणावलचि यत्तादो | जयध० ५ कुदो; वेदगसम्माइदिनुसंजदासजदाणं संखेजेहि भागेहि सह उवसम खइयसम्माइदिट- असजद - रासस संखेजाण भागाणमिह पहाणभावदसणादो | जयध० ६ कुदो, खइयसम्माइट्ठीण सखेजदिभागेण सह वेदगसम्माटि अमजदरासिस्त सखेजाग भागाणमिह पहाणत्तदसणादो । जयध० ७ कुदो; मिच्छाइट्ठिरासिस्स सखेजदिभागपमाणत्तादो | जयध ० ८ कुदो; भय-दुगुछाण दोण्ट पि समुदिदाणमुदयकालादो अष्णदर विरहिदकालस्स ससेजगुणत्तोवसादो | जयघ ९ किं कारण, अण्णदरविरहकालादो टोव्ह हि विरहिदकालरस सखेजगुणत्तावलवणादो । जयध० १० किं कारण, उवसम खइयसम्माइट्रिटजीवाण पलिदोवमासखेज भागवमाणाणमिह गणादो । जयभ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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