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________________ ४७४ फसाय पाहुड सुत्त [६ वेदक-अर्थाधिकार ३४. एयजीवेण कालो । ३५. एक्किस्से दोण्हं चदुण्हं पंचण्हं छहं सत्तण्हं अट्ठण्हं णवण्हं दसण्हं पयडीणं पवेसगो केवचिरं कालादो होदि १३६. जहण्णेण एयसमओ । ३७. उक्कस्सेणंतोमुहुत्तं । ३८. एगजीवेण अंतरं । ३९. एकिस्से दोहं चउण्हं पयडीणं पवेसर्गतरं केवचिरं कालादोहोदि ? ४०. जहण्णेण अंतोमुहुत्तं । ४१. उकस्सेण उवड्डपोग्गलपरियट्ट । ४२. पंचण्हं छण्हं सत्तण्हं पयडीणं पवेसगंतरं केवचिरं कालादो होदि १४३. जहण्णेण एयसमओ । ४४. उक्कस्सेण उबड्डपोग्गलपरियट्ट । ४५. अट्टण्हं णवण्हं पयडीणं पवेसगंतरं केवचिरं कालादो होदि १ ४६. जहण्णेण एयसमयो । ४७. उक्कस्सेण पुन्चकोडी देसूणा । ४८. दसण्हं पयडीणं पवेसगस्स अंतरं केवचिरं कालादो होदि १ ४९. जहपणेण अंतोमुहत्तं । ५०. उक्कस्सेण वे छावद्विसागरोवमाणि सादिरेयाणि । ५१. णाणाजीवेहि भंगविचयो । ५२. सव्वजीवा दसहं णवण्हमढण्ठं सत्तण्हं चूर्णिसू०-अव एक जीवकी अपेक्षा उदीरणास्थानोके कालका वर्णन करते हैं ॥३४॥ शंका-एक, दो, चार, पाँच, छह, सात, आठ, नौ और दश प्रकृतियोकी उदीरणाका कितना काल है ? ॥३५॥ समाधान-जघन्यकाल समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है ।।३६-३७॥ चूर्णिसू०-अब एक जीवकी अपेक्षा उदीरणा-स्थानोके अन्तरका वर्णन करते हैं ॥३८॥ शंका-एक, दो और चार प्रकृतिरूप उदीरणा स्थानोका अन्तर काल कितना है ? ॥३९॥ . समाधान-जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तरकाल उपार्धपुद्गलपरिवर्तन है ॥४०-४१॥ शंका-पांच, छह और सात प्रकृतिरूप उदीरणा-स्थानोका अन्तरकाल कितना है ? ॥४२॥ समाधान-जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल उपार्धपुद्गलपरिवर्तन है ॥४३-४४॥ शंका-आठ और नौ प्रकृतिरूप उदीरणा-स्थानोका अन्तरकाल कितना है ? ॥४५॥ समाधान-जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल देशोन पूर्वकोटी वर्ष है ॥४६-४७॥ शंका-दश प्रकृतिरूप उदीरणास्थानका अन्तरकाल कितना है ? ॥४८॥ समाधान-जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक दो वार छयासठ सागरोपम है।४९.५०॥ चूर्णिसू०-अव नाना जीवीकी अपेक्षा उदीरणास्थानोका भंगविचय कहते हैं-सर्व
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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