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________________ कसाय पाहुड सुच [ ६ वेदक अर्थाधिकार १२ २६. णवण्हं पयडीणं पवेसगस्स छ - चदुवीस भंगा" । २७. दसहं पयडीणं पवेसगस्स एक्क-चदुवीस भंगा " । २८. एदेसि भंगाणं गाहा दसण्हमुदीरणङ्काणमादिं कादू । २९. जहा ४७२ उसीके भयके विना और जुगुप्साके साथ षष्ठ २४ भंग होते हैं । भयकी उदीरणा करनेवाले सासादनसम्यग्दृष्टि के जुगुप्साके विना तथा अनन्तानुबन्धी किसी एक कपाय के प्रवेश से सप्तम २४ भंग, उसीके भयके विना जुगुप्साकी उदीरणा करनेपर अष्टम २४ भंग, संयुक्त प्रथमावलीमें वर्तमान मिथ्यादृष्टिके भय के साथ मिथ्यात्वकी उदीरणा करनेपर नवम २४ भंग, भयके विना और जुगुप्सा के साथ मिध्यात्वकी उदीरणा करनेवाले उक्त मिथ्यादृष्टिके दशम २४ भंग, तथा भय और जुगुप्साके विना अनन्तानुबन्धी किसी एक कषायके साथ मिथ्यात्वकी उदीरणा करनेवाले उक्त जीवके एकादशम २४ भंग होते है । इस प्रकार आठ प्रकृतियोकी उदीरणारूप स्थानके सब मिलाकर (२४ ११ = २६४) दो सौ छयासठ भंग होते हैं । चूर्णिसु० - नौ प्रकृतियोंकी उदीरणा करनेवाले के छह गुणित चौवीस भंग होते है ॥२६॥ विशेषार्थ - सम्यक्त्वप्रकृति, प्रत्याख्यानावरण, अप्रत्याख्यानावरण, संब्वलनसम्बन्धी क्रोधादि चतुष्टयमेसे कोई एक कषाय, तीनो वेदोमेसे कोई एक वेद, हास्य- रति और अरति शोक में से कोई एक युगल, भय और जुगुप्सा इन नौ प्रकृतियोकी उदीरणा करनेवाले असंयत वेदकसम्यग्दृष्टिके प्रथम २४ भंग होते है । उक्त प्रकृतियोमेंसे सम्यक्त्वप्रकृतिको निकालकर और सम्यग्मिथ्यात्वको मिलाकर उसकी उदीरणा करनेवाले सम्यग्मिथ्यादृष्टि के द्वितीय २४ भंग होते है | सम्यग्मिथ्यात्वके स्थानपर किसी एक अनन्तानुवन्धी के प्रवेश करनेपर उसकी उदीरणा करनेवाले सासादनसम्यग्दृष्टि के तीसरे प्रकारसे २४ भंग होते हैं । अनन्तानुबन्धीके स्थान - पर मिथ्यात्वप्रकृति के प्रवेश करनेपर संयुक्त प्रथमावलीवाले मिथ्यात्व के साथ उपयुक्त आठ प्रकृतियो की उदीरणा करनेवाले मिध्यादृष्टिके चतुर्थ २४ भंग, उसीके अनन्तानुवन्धी किसी एककी भयके विना जुगुप्साके साथ उदीरणा करनेपर पंचम २४ भंग, उसीके जुगुप्सा के विना भयके साथ उक्त प्रकृतियो की उदीरणा करनेवालेके छठे प्रकारसे २४ भंग होते है । इस प्रकार सब भंगोका योग ( २४x६ = १४४ ) एकसौ चवालीस होता है । चूर्णिसू०–दश प्रकृतियोकी उदीरणा करनेवाले के एक ही प्रकारसे चौवीस भंग होते हैं ॥२७॥ विशेषार्थ - मिध्यात्व, अनन्तानुबन्ध्यादिचतुष्टयमेंसे कोई एक कपायचतुष्क, तीन वेदोमे से कोई एक वेद, हास्यादि युगलद्वयमे से कोई एक युगल, भय और जुगुप्सा, इन दश प्रकृतियोंकी उदीरणा करनेवाले मिथ्यादृष्टि जीवके २४ भंग होते हैं । यहाँ अन्य किसी विकल्प के संभव न होनेसे एक ही प्रकारसे चौवीस भंग कहे गये हैं । चूर्णिसू०- ० - दश प्रकृतियोके उदीरणास्थानको आदि लेकरके ऊपर बतलाये गये भंगाकी निरूपण करनेवाली गाथा इस प्रकार है ।। २८-२९ ॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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