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________________ गा० ६२] प्रकृतिस्थान-उदीरणा-भंग-निरूपण ४७१ . २४. सत्तण्हं पयडीणं पवेसगस्स दस-चउवीस भंगा। २५. अट्टण्हं पयडीणं पवेसगस्स एकारस-चउवीस भंगा। २४ भंग, भय-जुगुप्साके उदयसे रहित वेदकसम्यग्दृष्टि संयतासंयतके किसी एक अप्रत्याख्यानावरणकषायकी उदीरणा करनेपर पष्ठ २४ भंग तथा औपशमिक या क्षायिकसम्यक्त्वी असंयतसम्यग्दृष्टिके भय-जुगुप्साके विना किसी एक अप्रत्याख्यानावरण कपायकी उदीरणा करनेपर सप्तम २४ भंग होते है । इस प्रकार सब मिलकर छह प्रकृतियोकी उदीरणा करनेवालोके एकसौ अड़सठ (१६८) भंग होते हैं । चूर्णिसू०-सात प्रकृतियोंकी उदीरणा करनेवालेके दस-गुणित चौबीस भंग होते है ॥२४॥ विशेषार्थ-वेदकसम्यक्त्वी प्रमत्त-अप्रमत्तसंयतके सम्यक्त्वप्रकृति, किसी एक संज्वलनकषाय, किसी एक वेद, हास्य, अरति युगलमेसे किसी एक युगल, भय और जुगुप्साके आश्रयसे प्रथम २४ भंग उत्पन्न होते है। औपशमिक या क्षायिक सम्यग्दृष्टि संयतासंयतके किसी एक प्रत्याख्यानावरणकषाय, भय और जुगुप्साके साथ द्वितीय २४ भंग, वेदकसम्यक्त्वी संयतासंयतके सम्यक्त्वप्रकृति और भयप्रकृतिके साथ तृतीय २४ भंग, उसीके भयक विना और जुगुप्साके साथ चतुर्थ २४ भंग होते हैं। औपशमिक या क्षायिकसम्यक्त्वी असंयतसम्यग्दृष्टिके भय और किसी एक अप्रत्याख्यानावरणकषायके साथ पंचम २४ भंग उसीके भयके विना और जुगुप्साके साथ पष्ठ २४ भंग तथा वेदकसम्यक्त्वी असंयतसम्यग्दृष्टिके भय-जुगुप्साके विना और सम्यक्त्वप्रकृतिके साथ सप्तम २४ भंग होते हैं। सम्यग्मिथ्याष्टिके भय-जुगुप्साके विना सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिके साथ अष्टम २४ अंग, सासादनसम्यग्दृष्टिके भय-जुगुप्साके विना किसी एक अनन्तानुबन्धी कषायके प्रवेशसे नवम २४ भंग और संयुक्त प्रथमावलीमें वर्तमान मिथ्यादृष्टिके अनन्तानुबन्धी, भय, जुगुप्साके विना दशम २४ भंग होते है। इसप्रकार सव मिलाकर (२४४ १०२४०) दो सौ चालीस भंग सात प्रकृतियोकी उदीरणा करनेवालेके होते है। चूर्णिसू०-आठ प्रकृतियोकी उदारणा करनेवालेके ग्यारह गुणित चौवीस भंग होते है ॥२५॥ विशेषार्थ-वेदकसम्यक्त्वी संयतासंयतके सम्यक्त्वप्रकृति, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलनसंबंधी एक-एक कषाय, कोई एक वेद, हास्यादि दो युगलमें से एक भय और जुगुप्सा इन आठ प्रकृतियोकी उदीरणा होती है, अतः इनकी अपेक्षा प्रथम २४ भंग, औपशमिक या क्षायिकसम्यग्दृष्टि असंयतके सम्यक्त्वप्रकृतिके विना और अप्रत्याख्यानावरणके साथ उन्ही प्रकृतियोके ग्रहण करनेपर द्वितीय २४ भंग, वेदकसम्यक्त्वी असंयतके जुगुप्साके विना और भयके साथ तृतीय २४ भंग, भयके विना और जुगुप्साके साथ चतुर्थ २४ भंग, सम्यग्मिथ्याष्टिके जुगुप्साके विना और सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिके साथ पंचम २४ भंग,
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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